Search This Blog

Sunday, September 27, 2026

नया भारत कितना बदला

नया भारत क्या वास्तव में बदला भी है,या झूठे बदलाव के साथ चल रहा हे?विपक्ष और सत्तापक्ष में छिड़ी बहस में क्या अंतर नजर आता हे आओ जाने


इंटरनेट और सोशल मीडिया पर भारतीयों के देखे जाने की रुचि (Viewership/Consumption Trends) के अनुसार 'नया भारत' डिजिटल रूप से पूरी तरह बदल चुका है। पारंपरिक टीवी और प्रिंट मीडिया के मुकाबले अब देश की अधिकांश आबादी अपनी दैनिक जानकारी, मनोरंजन और वित्तीय जरूरतों के लिए पूरी तरह ऑनलाइन हो चुकी है।नेट देखे जाने की बदलती रुचि और व्यवहार के आधार पर आए मुख्य बदलाव इस प्रकार हैं:1. टीवी स्क्रीन से 'स्मार्ट स्क्रीन' का सफरस्मार्ट टीवी और ओटीटी की मांग: भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (TRAI) के अनुसार भारत में टीवी देखने का तरीका तेजी से बदला है। पारंपरिक केबल कनेक्शन के बजाय लोग अब स्मार्ट टीवी और इंटरनेट-आधारित ओटीटी (OTT) प्लेटफॉर्म्स पर अपनी पसंद का कंटेंट देख रहे हैं।रील्स और शॉर्ट वीडियो की लत: यूट्यूब शॉर्ट्स और इंस्टाग्राम रील्स जैसे वर्टिकल शॉर्ट-फॉर्म वीडियो प्रारूपों को देखने में भारतीय सबसे आगे हैं, जिसने आम जनता के कंटेंट कंजम्पशन के समय को काफी बढ़ा दिया है।2. समाचारों के लिए मुख्यधारा टीवी चैनलों से दूरीडिजिटल और स्वतंत्र पत्रकारिता: टीवी पर कुल कंटेंट में से समाचारों की हिस्सेदारी घटकर मात्र 7% रह गई है। अब लोग टीआरपी आधारित टीवी चैनलों के बजाय यूट्यूब समाचार चैनलों और डिजिटल क्रिएटर्स पर भरोसा कर रहे हैं। ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में क्षेत्रीय स्वतंत्र यूट्यूब पत्रकारों को मिल रहे करोड़ों व्यूज इसका सबसे बड़ा प्रमाण हैं।3. केवल मनोरंजन नहीं, डिजिटल गवर्नेंस में रुचिडिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर: भारतीय यूजर्स की रुचि अब केवल इंटरनेट सर्फिंग तक सीमित नहीं है। सरकारी सेवाओं के ऑनलाइन होने से लोग UPI लेनदेन, डिजीलॉकर (जिसके 70 करोड़ से अधिक उपयोगकर्ता हैं) और सरकारी योजनाओं की जानकारी सीधे इंटरनेट पर खोज और देख रहे हैं। 106 करोड़ से अधिक ब्रॉडबैंड ग्राहकों के साथ वित्तीय और तकनीकी साक्षरता काफी बढ़ी है।4. पारंपरिक शिक्षा बनाम ऑनलाइन लर्निंगई-लर्निंग की ओर झुकाव: अब शिक्षा केवल क्लासरूम तक सीमित नहीं है। Coursera, edX और विभिन्न यूट्यूब चैनलों के माध्यम से कौशल विकास (Skill Development) और ऑनलाइन कोर्सेज देखने की रुचि भारतीय युवाओं में तेजी से बढ़ी है।5. स्थानीय और क्षेत्रीय भाषाओं की बाढ़स्थानीय कंटेंट (Hyper-local Content): इंटरनेट पर अब अंग्रेजी या शुद्ध हिंदी का दबदबा कम हुआ है। नेट पर भोजपुरी, तमिल, तेलुगु, पंजाबी और मराठी जैसी क्षेत्रीय भाषाओं के व्लॉग्स, पॉडकास्ट और मनोरंजन से जुड़े कंटेंट को देखने की रुचि अभूतपूर्व रूप से बढ़ी है, जिससे ग्रामीण भारत तेजी से मुख्यधारा से जुड़ रहा है।संक्षेप में कहें तो, नया भारत अब केवल "कंटेंट देखने वाला" उपभोक्ता नहीं रहा, बल्कि वह डिजिटल सेवाओं और अपनी क्षेत्रीय पहचान से जुड़े कंटेंट को चुन-चुनकर देखने वाला एक जागरूक और आधुनिक स्मार्ट यूजर बन चुका है।Scroll.inदर्शकों की बदलती रुचि और केंद्र सरकार द्वारा ऑनलाइन समाचारों पर ...अनुवाद किया गया — टीवी पर देखे जाने वाले कुल कंटेंट में समाचारों की हिस्सेदारी केवल 7% है और अधिक दर्शक शो और क्लिप ऑनलाइन देख रहे हैं, ऐसे में टीआरपी का महत्व कम होता जा रहा है।...
 डिजिटल इंडिया और भारतनेट (BharatNet) की बदौलत देश में इंटरनेट और डिजिटल सेवाओं का परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है। सरकारी आंकड़ों (TRAI, PIB और डिजिटल इंडिया रिपोर्ट्स) के अनुसार, भारत में इंटरनेट क्रांति से जुड़े मुख्य आंकड़े इस प्रकार हैं:
​
✍️ इंटरनेट और कनेक्टिविटी के आंकड़े
​यूज़र्स की संख्या: 2014 में जहाँ देश में लगभग 25.15 करोड़ इंटरनेट यूज़र्स थे, वहीं 2026 तक यह आंकड़ा बढ़कर 109 करोड़ (1.09 बिलियन) से अधिक हो गया है।  
​ब्रॉडबैंड सब्सक्राइबर: देश में हाई-स्पीड ब्रॉडबैंड इस्तेमाल करने वाले ग्राहकों की संख्या 106.58 करोड़ के पार पहुँच गई है।  
​डेटा की खपत: भारत में औसतन प्रति व्यक्ति मोबाइल डेटा खपत 19-20 GB प्रति माह से अधिक है, जो दुनिया में सबसे सस्ते और सबसे अधिक इस्तेमाल किए जाने वाले डेटा नेटवर्क में से एक है।
​
भारतनेट: ग्रामीण भारत में इंटरनेट
​गांवों तक इंटरनेट पहुँचाने के लिए शुरू किए गए भारतनेट प्रोजेक्ट ने जमीनी स्तर पर बड़ा बदलाव किया है:
​ग्राम पंचायतें कनेक्टेड: देश की 2.21 लाख से अधिक ग्राम पंचायतों को डिजिटल सेवाओं के लिए 'सर्विस रेडी' बनाया जा चुका है।  
​ऑप्टिकल फाइबर केबल (OFC): ग्रामीण इलाकों तक हाई-स्पीड कनेक्टिविटी पहुँचाने के लिए 7 लाख किलोमीटर से अधिक ऑप्टिकल फाइबर केबल बिछाई जा चुकी है।  
​
डिजिटल इकोनॉमी और UPI
​वैश्विक लेनदेन में दबदबा: भारत दुनिया के कुल रियल-टाइम डिजिटल पेमेंट्स का लगभग 49% हिस्सा अकेले प्रोसेस करता है।  
​UPI की रफ्तार: वित्तीय वर्ष 2025-26 में UPI से 24,100 करोड़ से अधिक लेनदेन दर्ज किए गए।  
​डीबीटी (Direct Benefit Transfer): जन धन, आधार और मोबाइल (JAM) की तिकड़ी के जरिए 51 लाख करोड़ रुपये से अधिक की सरकारी सब्सिडी और सहायता राशि सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में बिना बिचौलियों के ट्रांसफर की गई है।  
​
 ई-गवर्नेंस और डिजिटल सेवाएं
​डिजिलॉकर (DigiLocker): 70 करोड़ से अधिक रजिस्टर्ड यूज़र्स और 850 करोड़ से अधिक डिजिटल डॉक्यूमेंट्स जारी किए जा चुके हैं।  

​ई-संजीवनी (eSanjeevani): 

इस टेलीमेडिसिन प्लेटफॉर्म के जरिए ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में रहने वाले लोग 48 करोड़ से अधिक बार मुफ्त ऑनलाइन डॉक्टर कंसल्टेशन ले चुके हैं।  
​मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग: 2014 के मुकाबले इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन में भारी उछाल आया है और भारत अब दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन निर्माता देश बन चुका है। तो दूसरी तरफ नए भारत के पोर्न प्रवृति रुझानों में भी व्यापक बढ़त मिली हुई है।
इंटरनेट डेटा रिपोर्टों, वेब ट्रैफिक एनालिटिक्स और सर्च ट्रेंड्स के अनुसार, भारत में पोर्नोग्राफिक (वयस्क) सामग्री खोजने और देखने वालों की कुल संख्या में लगातार बढ़ोतरी हुई है, लेकिन इसके तरीके और रुझान में बदलाव आया है।
इंटरनेट के प्रसार और वयस्कों की ऑनलाइन उपस्थिति के आधार पर स्थिति इस प्रकार है:
1. यूज़र्स की संख्या बढ़ी है (कुल वॉल्यूम)
 स्मार्टफोन और सस्ते डेटा का असर: 2016-2017 में 4G क्रांति के बाद भारत में इंटरनेट यूज़र्स की संख्या 25 करोड़ से बढ़कर 100 करोड़ के पार पहुँची है। इसके साथ ही इंटरनेट पर वयस्क सामग्री की खोज करने वालों की कुल संख्या में भी वृद्धि हुई है।
 
 मोबाइल ट्रैफिक में बढ़त: वैश्विक डेटा रिपोर्टों के अनुसार, भारत में अडल्ट वेबसाइट्स पर आने वाले 85% से 90% से अधिक यूज़र्स मोबाइल का उपयोग करते हैं।

 ब्लॉक के बावजूद ट्रैफिक का दूसरा रास्ता
 वेबसाइट बैन का प्रभाव: भारत सरकार द्वारा 800 से अधिक मुख्य पोर्नोग्राफिक वेबसाइटों पर प्रतिबंध लगाने के बावजूद खोज समाप्त नहीं हुई।
 मिरर साइट्स और VPN: बैन के बाद लोग नए डोमेन (मिरर या प्रॉक्सी साइट्स), VPN (वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क) सेवाओं और सर्च इंजनों पर नए शब्दों (Keywords) के जरिए ऐसी सामग्री खोजते हैं।
 वेब एनालिटिक्स डेटा: सिमिलरवेब (Similarweb) जैसी ट्रैफिक एनालिटिक्स एजेंसियों के अनुसार, भारत में शीर्ष 50 सबसे ज़्यादा विज़िट की जाने वाली वेबसाइटों में अक्सर कुछ अडल्ट-मिरर डोमेन/वेबसाइट्स शामिल रहती हैं।
3. खोज के तरीकों में बदलाव
 
 सोशल मीडिया और मैसेजिंग ऐप्स पर शिफ्ट: अब लोग सिर्फ सर्च इंजन या मुख्य वेबसाइट्स पर ही पोर्न नहीं खोजते, बल्कि टेलीग्राम ग्रुप्स, रेडिट और अन्य गुप्त मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स के जरिए भी ऐसी सामग्री एक्सेस करते हैं।

निष्कर्ष:

सर्च इंजनों और अडल्ट साइट एनालिटिक्स के आंकड़े यही दर्शाते हैं कि इंटरनेट की पहुँच बढ़ने के कारण पोर्न खोजने और देखने वालों की संख्यात्मक (Absolute Numbers) वृद्धि हुई है, भले ही सरकारी बैन और नियमों के कारण खोज के तरीके बदल गए हों।कुल मिलाकर कहा जा सकता है नया भारत हर क्षेत्र में तेजी से बदल रहा है।

त्रिफला


त्रिफला

पारंपरिक आयुर्वेद में त्रिफला बनाने का सबसे प्रामाणिक और प्रसिद्ध अनुपात 1:2:4 (विषम अनुपात) माना जाता है, हालांकि समान मात्रा 1:1:1 (सम अनुपात) का भी व्यापक उपयोग होता है।
आप अपनी आवश्यकता अनुसार नीचे दिए गए दोनों तरीकों में से एक चुन सकते हैं:

✍️. 1:2:4 का प्रामाणिक अनुपात (सबसे उत्तम)
आयुर्वेद ग्रंथ (जैसे वाग्भट संहिता) के अनुसार त्रिफला का सबसे संतुलित और प्रभावकारी अनुपात:
  हरड़ (Haritaki): 1 भाग (जैसे 100 ग्राम)
 बहेड़ा (Bibhitaki): 2 भाग (जैसे 200 ग्राम)
  आंवला (Amalaki): 4 भाग (जैसे 400 ग्राम) विशेषता: यह अनुपात तीनों दोषों (वात, पित्त, कफ) को संतुलित करने और शरीर के कायाकल्प/रसायन के लिए सबसे बेहतर माना जाता है।
✍️. 1:1:1 का सम अनुपात (सामान्य उपयोग)
यदि आप दैनिक पेट की सफाई (कब्ज दूर करने) के लिए साधारण घरेलू चूर्ण बनाना चाहते हैं:
 हरड़: 1 भाग (100 ग्राम)
 बहेड़ा: 1 भाग (100 ग्राम)
 आंवला: 1 भाग (100 ग्राम)
बनाने की सही विधि
 गुठली निकालें: बाजार से साबुत सूखी हरड़, बहेड़ा और आंवला लाएं। इनकी गुठलियां निकालकर अलग फेंक दें केवल फल का छिलका/गूदा ही इस्तेमाल करें।
 सुखाएं: फल के छिलकों को 1-2 दिन धूप में अच्छी तरह सुखा लें ताकि नमी न रहे।
 पीसें: तीनों सामग्रियों को अलग-अलग कूटकर मिक्सी या इमामदस्ते में बारीक पाउडर बना लें।
 मिलाएं: मापने के वजन के अनुसार (1:2:4 या 1:1:1) तीनों पाउडर को आपस में अच्छी तरह मिलाकर किसी कांच के साफ और सूखे एयर-टाइट जार में रख लें।
सेवन की सही मात्रा व समय

समय | मात्रा | किसके साथ लें | लाभ |

रात को (सोने से पहले) 3 से 5 ग्राम (आधा से 1 चम्मच) 
गुनगुने पानी या दूध के साथ | कब्ज, पाचन और पेट की सफाई के लिए |

सुबह (खाली पेट) | 3 से 5 ग्राम | ताजे पानी या शहद/गुड़ के साथ | शरीर के विषैले तत्व निकालने (Detox) और वजन घटाने के लिए |
त्रिफला कलौंजी (हरड़, बहेड़ा, आंवला और कलौंजी) का मिश्रण आमतौर पर बालों की देखभाल (हेयर पैक या तेल) या पेट/स्वास्थ्य संबंधी उपयोग के लिए बनाया जाता है।
इसे बनाने की दो सबसे प्रमुख विधियां नीचे दी गई हैं:

✍️. बालों के लिए: त्रिफला और कलौंजी का हेयर पैक (Hair Pack)
यह पैक बालों का झड़ना रोकने, डैंड्रफ खत्म करने और बालों को काला व मजबूत बनाने में मददगार है।

सामग्री:
 
त्रिफला पाउडर: 2 चम्मच
 कलौंजी (मंगरैल): 1 चम्मच (पीसी हुई या बारीक पाउडर)
 दही या पानी: आवश्यकतानुसार (पेस्ट बनाने के लिए)
 लोहे की कढ़ाई: (बेहतर परिणाम के लिए)

✍️बनाने की विधि:
 
कलौंजी को मिक्सी में पीसकर बारीक पाउडर बना लें।
 एक लोहे की कढ़ाई में 2 चम्मच त्रिफला पाउडर और 1 चम्मच कलौंजी पाउडर मिलाएं।
 इसमें दही, चायपत्ती का उबला पानी या साधारण पानी मिलाकर गाढ़ा पेस्ट बना लें।
 इस पेस्ट को ढककर रात भर (या कम से कम 4-5 घंटे) लोहे की कढ़ाई में ही रहने दें। इससे मिश्रण में लोहे का प्राकृतिक गुण आ जाता है, जो बालों को काला करने में मदद करता है।

✍️उपयोग करने का तरीका:
 
सुबह इस पेस्ट को अपनी जड़ों से लेकर बालों की पूरी लंबाई तक लगाएं।
 45 मिनट से 1 घंटे तक सूखने दें।
 इसके बाद सादे पानी से बाल धो लें (उसी दिन शैम्पू न करें, अगले दिन करें)।
✍️. सेहत/पाचन के लिए: त्रिफला और कलौंजी का चूर्ण
यदि इसे पाचन या वजन नियंत्रित करने के लिए सेवन करना हो:

✍️सामग्री:
 
त्रिफला चूर्ण: 100 ग्राम
 कलौंजी पाउडर: 25 ग्राम (हल्की भुनी और पिसी हुई)
बनाने की विधि:
 कलौंजी को धीमी आंच पर 1-2 मिनट हल्का सा भून लें ताकि इसकी नमी खत्म हो जाए।
  ठंडी होने पर कलौंजी को बारीक पीस लें।
 इसे त्रिफला चूर्ण में अच्छी तरह मिलाकर किसी साफ कांच के जार (Air-tight Container) में भरकर रख लें।

✍️सेवन की विधि:
 
मात्रा: आधा छोटा चम्मच (लगभग 3-5 ग्राम)।
 समय: रात को सोने से पहले गुनगुने पानी के साथ। 

✍️🙏नोट ध्यान दें: यदि आप इसे स्वास्थ्य के लिए खा रहे हैं, तो गर्भवतियों और गंभीर बीमारी से ग्रस्त लोगों को इसका सेवन करने से पहले चिकित्सक या वैद्य की सलाह जरूर लेनी चाहिए।

Friday, September 25, 2026

अमीर गरीब सब का श्रादोत्सव


श्राद्ध पक्ष (पितृ पक्ष) श्रद्धा और भावना का पर्व है। 

शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है कि "श्राद्धं कुरुते यथाशक्ति" — अर्थात श्राद्ध अपनी क्षमता और सामर्थ्य के अनुसार ही करना चाहिए। पितृगण केवल भाव, जल और भक्ति के भूखे होते हैं, आडंबर या धन-प्रदर्शन के नहीं।
चाहे सामर्थ्य सीमित हो या अधिक, घर पर ही पितरों का आह्वान (आगमन), तर्पण-अर्पण (श्राद्ध) और विसर्जन (विदाई) पूरी विधि विधान और सरलता से किया जा सकता है।

 पितरों का आह्वान (घर पर आगमन)
पितृ पक्ष की प्रतिपदा (या आपकी तिथि) के दिन सुबह स्नान के बाद घर पर पितरों का शांत मन से स्मरण करें।
 
स्थान: घर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) या दक्षिण दिशा की तरफ मुख करके एक साफ स्थान या चौकी पर लाल/सफेद कपड़ा बिछाएं।

आह्वान विधि: हाथ जोड़कर दक्षिण दिशा की ओर मुख करें और कहें:
   
"हे मेरे पूजनीय पितृगण! आप इस श्राद्ध पक्ष में हमारे घर पधारें और हमारा दिया हुआ भावपूर्ण जल व अन्न स्वीकार करें।"
   
  यदि पितरों की तस्वीर हो तो उसे चौकी पर रखें और सामने एक सरसों के तेल या शुद्ध घी का दीपक और धूप जलाएं।

 तर्पण और अर्पण (श्राद्ध विधि)

तर्पण का अर्थ है पितरों को जल से तृप्त करना। यह क्रिया अत्यंत सरल है और इसमें किसी बड़े खर्च की आवश्यकता नहीं होती।

सरलता से तर्पण करने का नियम

 सामग्री: एक तांबे या पीतल का पात्र (लोटा), स्वच्छ जल, थोड़ा सा कच्चा दूध, काले तिल, कुशा (यदि उपलब्ध हो) और जौ।

 दिशा: तर्पण सदैव दक्षिण दिशा की ओर मुख करके किया जाता है।
 
 विधि:
 
पात्र में जल भरकर उसमें थोड़ा सा दूध और काले तिल मिलाएं।
 हाथ की अंजलि (हथेली) में जल लेकर अंगूठे और तर्जनी उंगली के बीच के भाग (पितृ तीर्थ) से जल को पात्र में या किसी गमले/थाली में छोड़ें।
  
जल अर्पित करते समय 3 बार कहें: "ओम पितृभ्यो नमः" या "अस्मत्पितॄन् आवाहयामि तर्पयामि"।
अमीर-गरीब: सामर्थ्य के अनुसार अर्पण (4 तरीके)
श्राद्ध कर्म में भोजन 

अर्पित करने और दान देने के लिए अपनी क्षमता के अनुसार इनमें से कोई भी विकल्प चुन सकते हैं। सभी का पुण्य समान है:

वर्ग / सामर्थ्य | अर्पण व भोजन विधि | दान एवं संकल्प।

उत्तम (पूर्ण सामर्थ्य वाले लोग)

 ब्राह्मणों को घर बुलाकर सात्विक भोजन (खीर, पूरी, सब्जी) कराएं। 

पंचबलि

 (1गाय, 2कुत्ता, 3कौआ, 4देव, 5चींटी) का भाग निकालें। | कपड़े, बर्तन, अनाज और दक्षिणा देकर आशीर्वाद लें।

मध्यम (सामान्य सामर्थ्य) 

स्वयं सात्विक भोजन बनाएं। सबसे पहले पंचबलि (5 छोटे पत्तों या प्लेट में थोड़ा भोजन) निकालें और गाय, कौए व कुत्ते को दें। 
किसी एक ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को भोजन (अन्न दान) कराएं। 

पके अन्न का महत्व ही होता है

सीमित सामर्थ्य (गरीब/साधारण) | घर में बने साधारण भोजन (दाल-चावल/रोटी) से पंचबलि निकालें। | 'सीधा' दान: थोड़ा कच्चा आटा, दाल, चावल, नमक, हल्दी और एक फल किसी मंदिर में या ज़रूरतमंद को दें।अत्यंत निर्धन (शून्य खर्च)  केवल जल में काले तिल डालकर दक्षिण दिशा में तर्पण करें और दोपहर 12 बजे (कुतूप काल) सूर्य देव की ओर हाथ उठाएं। | दोनों हाथ उठाकर कहें: "हे पितृगण! मेरे पास धन व साधन नहीं हैं, मैं भाव से प्रणाम करता हूँ, आप तृप्त हों।" 

पंचबलि का महत्व: 

कौए, गाय और कुत्ते को दिया गया भोजन सीधे पितरों तक पहुँचता है। यदि आप ब्राह्मण भोज न करा सकें, तो केवल पंचबलि निकालकर भी श्राद्ध पूरा माना जाता है।


 पितरों की वापसी और विसर्जन

पितृ पक्ष की अंतिम तिथि (सर्वपितृ अमावस्या) पर पितरों की ससम्मान विदाई की जाती है।
 
 समय: अमावस्या के दिन दोपहर 12:00 से 12:30 बजे (कुतूप काल) के बीच विसर्जन का सबसे उत्तम समय होता है।

दीपक और जल: 

घर के मुख्य द्वार पर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके एक दीपक जलाएं और जल का पात्र रखें।
 
विसर्जन प्रार्थना:

 हाथ जोड़कर पितरों से क्षमा-याचना करें:
   
"हे पितृदेव! हमारी क्षमता के अनुसार जो बन पड़ा, हमने अर्पित किया। हमारी भूल-चूक को क्षमा करें, परिवार पर अपना आशीर्वाद बनाए रखें और सुख-समृद्धि का वरदान देकर अपने लोक को प्रस्थान करें।"
  
 
इसके बाद दक्षिण दिशा की ओर प्रणाम कर पितरों को विदा करें।
ध्यान रखने योग्य मुख्य बातें
 
 समय: श्राद्ध और तर्पण का कार्य हमेशा दोपहर के समय (11:30 AM से 12:30 PM) करना चाहिए। सुबह या शाम को तर्पण न करें।
 
भावना का महत्व: 

शास्त्रों में कहा गया है कि यदि किसी के पास जल अर्पित करने की भी सामर्थ्य न हो, तो वह केवल गाय को घास खिला दे या एकांत में जाकर आंसू बहाकर पितरों को याद कर ले, उससे भी पितृ प्रसन्न हो जाते हैं।

Monday, September 21, 2026

जुबेदा (मृत्यु)

जुबैदा🎂19 जनवरी 1911⚰️ 21 सितंबर 1988
जुबैदा
भारतीय सिनेमा की मूक और बोलती फिल्मों की अभिनेत्री जुबैदा को उनकी जयंती पर याद करते हुए: एक श्रद्धांजलि 

 जुबैदा (19 जनवरी 1911 - 21 सितंबर 1988) एक भारतीय फिल्म अभिनेत्री थीं। उन्होंने कई मूक और पहली भारतीय बोलती फिल्म आलम आरा (1931) में अभिनय किया। उनकी उपलब्धियों में शुरुआती हिट फिल्में देवदास (1937) एक असमिया फिल्म और सागर मूवीटोन की पहली बोलती फिल्म मेरी जान शामिल हैं। 
19 जनवरी 1919 को सूरत शहर में जन्मी जुबैदा एक मुस्लिम राजकुमारी थीं, जो सचिन स्टेट के नवाब सिदी इब्राहिम मुहम्मद याकूत खान तृतीय और फातिमा बेगम की बेटी थीं। उनकी दो बहनें थीं, सुल्ताना और शहजादी, दोनों ही अभिनेत्रियाँ थीं।  वह उन चंद लड़कियों में से थीं जिन्होंने कम उम्र में ही फिल्मों में प्रवेश किया, उस समय जब इसे सम्मानित परिवारों की लड़कियों के लिए उचित पेशा नहीं माना जाता था, राजघरानों की तो बात ही छोड़िए।

ज़ुबैदा सिर्फ़ 12 साल की थीं जब उन्होंने कोहिनूर में अपनी शुरुआत की। 1920 के दशक में उन्होंने सुल्ताना के साथ स्क्रीन पर कभी-कभार ही काम किया, जो तब तक भारतीय सिनेमा की सबसे प्यारी अभिनेत्रियों में से एक बन चुकी थीं। दोनों बहनों की एक फ़िल्म 1924 में कल्याण खजीना थी। उन्होंने दो साल पहले रिलीज़ हुई ज़ुबैदा की पहली ब्लॉकबस्टर, वीर अभिमन्यु में भी स्क्रीन शेयर की थी, जिसमें उनकी माँ फ़ातिमा बेगम ने भी अहम भूमिका निभाई थी।

1925 में ज़ुबैदा की 9 फ़िल्में रिलीज़ हुईं, जिनमें काला चोर, देवदासी और देश का दुश्मन शामिल हैं। एक साल बाद उन्होंने अपनी माँ की फ़िल्म बुलबुल-ए-परिस्तान में अभिनय किया।  1927 उनके लिए यादगार रहा, क्योंकि इस समय लैला मजनू, ननंद भोजाई और नवल गांधी का बलिदान जैसी फिल्में बहुत सफल रहीं। रवींद्रनाथ टैगोर की 'बलिदान' पर आधारित इस फिल्म में सुलोचना देवी, मास्टर विट्ठल और जल खंबाटा ने भी काम किया था। इस फिल्म में बंगाल के कुछ काली मंदिरों में पशु बलि की सदियों पुरानी प्रथा की निंदा की गई थी। भारतीय सिनेमेटोग्राफ समिति के सदस्य इस "उत्कृष्ट और सही मायने में भारतीय फिल्म" से बहुत प्रभावित हुए। इसके यूरोपीय सदस्यों ने सिफारिश की कि इसे स्क्रीनिंग के लिए विदेश भेजा जाए।

ज़ुबैदा ने कई मूक फिल्मों में काम किया, इससे पहले कि आलम आरा उनके करियर में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई और उनकी सबसे बड़ी हिट साबित हुई। अचानक उनकी मांग बहुत बढ़ गई और उन्हें उस समय फिल्म उद्योग में एक महिला के लिए मानकों से कहीं अधिक वेतन मिलता था।

30 और 40 के दशक की शुरुआत में उन्होंने जल मर्चेंट के साथ एक हिट टीम बनाई और कई सफल पौराणिक फिल्मों में सुभद्रा, उत्तरा और द्रौपदी जैसे किरदार निभाए।  वह एज्रा मीर की ज़रीना जैसी फ़िल्मों में भावनाओं को चित्रित करने में भी सफल रहीं, जिसमें उन्होंने एक जीवंत, अस्थिर सर्कस लड़की की भूमिका निभाई, जिसके चुंबन स्क्रीन पर गर्माहट भर देते थे और सेंसरशिप पर गरमागरम बहस को जन्म देते थे। ज़ुबैदा मूक युग से बोलती फ़िल्मों में सफल बदलाव करने वाली कुछ अभिनेत्रियों में से एक थीं।

1934 में उन्होंने नानूभाई वकील के साथ महालक्ष्मी मूवी-टोन की स्थापना की और गुल-ए-सोनोबार और रसिक-ए-लैला में बॉक्स-ऑफ़िस पर खूब कमाई की। वह 1949 तक साल में एक या दो फ़िल्मों में नज़र आती रहीं। निर्दोष अबला उनकी आखिरी फ़िल्म थी।

ज़ुबैदा ने हैदराबाद के महाराज नरसिंहगीर धनराजगीर ज्ञान बहादुर से शादी की। वह हुमायूं धनराजगीर और धुरेश्वर धनराजगीर की माँ थीं। धुरेश्वर मॉडल रिया पिल्लई की माँ हैं।

ज़ुबैदा ने अपने आखिरी साल 1987 में परिवार के बॉम्बे महल, धनराज महल में बिताए।  21 सितम्बर 1988 को बम्बई में उनकी मृत्यु हो गई और उन्हें छत्रपति शिवाजी महाराज मार्ग, अपोलो बन्दर, कोलाबा, दक्षिण मुम्बई में दफनाया गया।  
 🎬 जुबैदा की फिल्मोग्राफी -
 1949 
निर्दोश अबला और दुनिया
 1948
 नेक दिल, मेला 
 1946
 दिल और बदनामी
 1937 
प्यारी और औरत की जिंदगी
 1936 
बम्बई, माँ और लैलो नेहर
 1935 
गुलशने-ए-आलम और बिरदल के बेटी
 1934 
सेवा सदा, रश्क-ए-लैला, नन्द के लाला, 
ननंद भोजाई और गुल सनोबर
 1933 
महाभारत, पांडव कौरव ,बुलबुले पंजाब और अछूत
 1932
 सुभद्रा हरण और मीराबाई
 1931 
अंडरवर्ल्ड, पिरामिडों की भूमि,आँख के बदले आँख, रोमांटिक राजकुमार,आलम आरा और वीर अभिमन्यु
 1930 
वीर राजपूत, लव एंगल, फ़ॉल ऑफ़ प्राइड और देवदासी
 1929
 यंग इंडिया, वंडरफुल प्रिंस, मिलन दीनार,  महा  सुंदर, जादुई बांसुरी और कनक तारा
 1928
 हीर रांझा, गोल्डन गैंग, सम्राट अशोक और चमकती चंदा
 1927 
बलिदान, ननंद भोजाई और लैला मजनू
 1926
 सती मेनादेवी, मिसिंग ब्रेसलेट, कश्मीरा,मनुष्य उसकी नियति, बुलबुले परस्तान और अबोला रानी
 1925
 दिव्य दंड, राजनगर की रंभा, इंद्र सभा, देवदासी और काला चोर
 1924
 सती सरदारबा, पृथ्वी वल्लभ, मनोरमा, काला नाग और गुल बकावली
 

Sunday, September 20, 2026

मालिका तरनूम(जनम)

नूरजहाँ 🎂जन्म 21 सितम्बर, 1926 ⚰️23 दिसम्बर, 2000 
महान गायिका मल्लिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ 
🎂जन्म 21 सितम्बर, 1926 ई.
⚰️23 दिसम्बर, 2000 

नूरजहाँ 'भारतीय सिनेमा' की ख्याति प्राप्त अभिनेत्री और पार्श्वगायिकाओं में से एक थीं। उनका वास्तविक नाम 'अल्ला वसई' था। दक्षिण एशिया की महानतम गायिकाओं में शुमार की जाने वाली 'मल्लिका-ए-तरन्नुम' नूरजहाँ को लोकप्रिय संगीत में क्रांति लाने और पंजाबी लोकगीतों को नया आयाम देने का श्रेय जाता है। उनकी गायकी में वह जादू था कि हर उदयमान गायक की प्रेरणा स्रोत स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर ने भी जब अपने कॅरियर का आगाज किया तो उन पर नूरजहाँ की गायकी का प्रभाव था। नूरजहाँ अपनी आवाज़ में नित्य नए प्रयोग किया करती थीं। अपनी इन खूबियों की वजह से ही वे ठुमरी गायिकी की महारानी कहलाने लगी थीं।
जन्म_तथा_शिक्षा
नूरजहाँ का जन्म 21 सितम्बर, 1926 ई. को ब्रिटिश भारत में पंजाब के 'कसूर' नामक स्थान पर एक मुस्लिम परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम 'मदद अली' था और माता 'फ़तेह बीबी' थीं। नूरजहाँ के पिता पेशेवर संगीतकार थे। माता-पिता की ग्यारह संतानों में से नूरजहाँ एक थीं।संगीतकारों के परिवार में जन्मी नूरजहाँ को बचपन से ही संगीत के प्रति गहरा लगाव था। नूरजहाँ ने पाँच-छह साल की उम्र से ही गायन शुरू कर दिया था। वे किसी भी लोकगीत को सुनने के बाद उसे अच्छी तरह याद कर लिया करती थीं। इसको देखते हुए उनकी माँ ने उन्हें संगीत का प्रशिक्षण दिलाने का इंतजाम किया। उस दौरान उनकी बहन 'आइदान' पहले से ही नृत्य और गायन का प्रशिक्षण ले रही थीं।

फ़िल्मों_में_प्रवेश


तत्कालीन समय में कलकत्ता, वर्तमान कोलकाता थिएटर का गढ़ हुआ करता था। वहाँ अभिनय करने वाले कलाकारों, पटकथा लेखकों आदि की काफ़ी माँग थी। इसी को ध्यान में रखकर नूरजहाँ का परिवार 1930 के दशक के मध्य में कलकत्ता चला आया। जल्द ही नूरजहाँ और उनकी बहन को वहाँ नृत्य और गायन का अवसर मिल गया। नूरजहाँ की गायकी से प्रभावित होकर संगीतकार ग़ुलाम हैदर ने उन्हें के. डी. मेहरा की पहली पंजाबी फ़िल्म 'शीला' उर्फ 'पिंड दी कुड़ी' में उन्हें बाल कलाकार की संक्षिप्त भूमिका दिलाई। वर्ष 1935 में रिलीज हुई यह फ़िल्म पूरे पंजाब में हिट रही। इसने 'पंजाबी फ़िल्म उद्योग' की स्थापना का मार्ग प्रशस्त कर दिया। फ़िल्म के गीत बहुत हिट रहे।

सफलता_व_विवाह
1930 के दशक के उत्तरार्ध तक लाहौर में कई स्टूडियो अस्तित्व में आ गए थे। गायकों की बढ़ती माँग को देखते हुए नूरजहाँ का परिवार 1937 में लाहौर आ गया। डलसुख एल पंचोली ने बेबी नूरजहाँ को सुना और 'गुल-ए-बकवाली' फ़िल्म में उन्हें भूमिका दी। यह फ़िल्म भी काफ़ी हिट रही और गीत भी बहुत लोकप्रिय हुए। इसके बाद उनकी 'यमला जट' (1940), 'चौधरी' फ़िल्म प्रदर्शित हुई। इनके गाने 'कचियाँ वे कलियाँ ना तोड़' और 'बस बस वे ढोलना कि तेरे नाल बोलना' बहुत लोकप्रिय हुए। वर्ष 1942 में नूरजहाँ ने अपने नाम से 'बेबी' शब्द हटा दिया। इसी साल उनकी फ़िल्म 'खानदान' आई, जिसमें पहली बार उन्होंने लोगों का ध्यान आकर्षित किया। इसी फ़िल्म के निर्देशक शौक़त हुसैन रिज़वी के साथ उन्होंने विवाह कर लिया। बाद के समय में नूरजहाँ ने अपने से दस वर्ष छोटे 'एजाज दुर्रानी' से विवाह किया।

मुम्बई_आगमन


वर्ष 1943 में नूरजहाँ मुम्बई चली आईं। महज चार साल की संक्षिप्त अवधि के भीतर वे अपने सभी समकालीनों से काफ़ी आगे निकल गईं। भारत और पाकिस्तान दोनों जगह के पुरानी पीढ़ी के लोग उनकी क्लासिक फ़िल्मों 'लाल हवेली'’ 'जीनत', 'बड़ी माँ', 'गाँव की गोरी' और 'मिर्जा साहिबाँ' फ़िल्मों के आज भी दीवाने हैं। फ़िल्म 'अनमोल घड़ी' का संगीत अपने समय के ख्यातिप्राप्त संगीतकार नौशाद ने दिया था। उसके गीत 'आवाज दे कहाँ है', 'जवाँ है मोहब्बत' और 'मेरे बचपन के साथी' जैसे गीत आज भी लोगों की जुबाँ पर हैं।


लाहौर_प्रस्थान


नूरजहाँ देश के विभाजन के बाद अपने पति शौक़त हुसैन रिज़वी के साथ बंबई छोड़कर लाहौर चली गईं। लाहौर में रिजवी ने एक स्टूडियो का अधिग्रहण किया और वहाँ 'शाहनूर स्टूडियो' की शुरुआत की। 'शाहनूर प्रोडक्शन' ने फ़िल्म 'चन्न वे' (1950) का निर्माण किया, जिसका निर्देशन नूरजहाँ ने किया। यह फ़िल्म बेहद सफल रही। इसमें 'तेरे मुखड़े पे काला तिल वे' जैसे लोकप्रिय गाने थे। उनकी पहली उर्दू फ़िल्म 'दुपट्टा'’ थी। इसके गीत 'चाँदनी रातें...चाँदनी रातें' आज भी लोगों की जुबाँ पर हैं।


देश के विभाजन के बाद जहाँ एक तरफ़ ए. आर. कारदार और महबूब ख़ान जैसे कलाकार यहीं रह गए, वहीं बहुत-से ऐसे कलाकार भी थे, जिन्हें पाकिस्तान चले जाना पड़ा था। नूरजहाँ भी इनमें से एक थीं। भारत छोड़ पाक़िस्तान जा बसने की उनकी मजबूरी के बारे में उन्होंने 'विविध भारती' में बताया था कि- "आपको ये सब तो मालूम है, ये सबों को मालूम है कि कैसी नफ़सा-नफ़सी थी, जब मैं यहाँ से गई। मेरे


मियाँ मुझे ले गए और मुझे उनके साथ जाना पड़ा, जिनका नाम सैय्यद शौक़त हुसैन रिज़वी है। उस वक़्त अगर मेरा बस चलता तो मैं उन्हें समझा सकती, कोई भी अपना घर उजाड़ कर जाना तो पसन्द नहीं करता, हालात ऐसे थे कि मुझे जाना पड़ा। और ये आप नहीं कह सकते कि आप लोगों ने मुझे याद रखा और मैंने नहीं रखा, अपने-अपने हालात ही की बिना पे होता है किसी-किसी का वक़्त निकालना, और बिलकुल यकीन करें, अगर मैं सबको भूल जाती तो मैं यहाँ कैसे आती?"

पाकिस्तान स्थानान्तरित हो जाने से पहले नूरजहाँ के अभिनय व गायन से सजी दो फ़िल्में 1947 में प्रदर्शित हुई थीं- 'जुगनू' और 'मिर्ज़ा साहिबाँ'। 'जुगनू' शौक़त हुसैन रिज़वी की फ़िल्म थी 'शौक़त आर्ट प्रोडक्शन्स' के बैनर तले निर्मित, जिसमें नूरजहाँ के नायक दिलीप कुमार थे। संगीतकार फ़िरोज़ निज़ामी ने मोहम्मद रफ़ी और नूरजहाँ से एक ऐसा डुएट गीत इस फ़िल्म में गवाया, जो इस जोड़ी का सबसे ज़्यादा मशहूर डुएट सिद्ध हुआ। गीत था "यहाँ बदला वफ़ा का बेवफ़ाई के सिवा क्या है, मोहब्बत करके भी देखा, मोहब्बत में भी धोखा है"। इस गीत की अवधि क़रीब 5 मिनट और 45 सेकण्ड्स की थी, जो उस ज़माने के लिहाज़ से काफ़ी लम्बी थी। कहते हैं कि इस गीत को शौक़त हुसैन रिज़वी ने ख़ुद ही लिखा था, पर 'हमराज़ गीत कोश' के अनुसार फ़िल्म के गीत एम. जी. अदीब और असगर सरहदी ने लिखे थे।


📽️प्रमुख_फ़िल्में


1. यमला जट 1940 

2. रेड सिग्नल 1941
3. सुसराल 1941 
4. खानदान 1942
5. नादान 1943 
6. दुहाई 1943
7. लाल हवेली 1944 
8. गाँव की गोरी 1945
9. बड़ी माँ 1945 
10. भाईजान 1945
11. अनमोल घड़ी 1946 
12. जादूगर 1946
13. जुगनू 1947 
14. चनवे 1951
15. दुपट्टा 1952 
16. गुलनार 1953
17. फ़तेह ख़ान 1955 
18. इंतज़ार 1956
19. लख़्त-ए-जिगर 1956 
20. अनारकली 1958
21. छूमंतर 1958 
22. परदेशियाँ 1959
23. कोयल 1959 
24. मिर्ज़ा गालिब 1961

अंतिम_फ़िल्म


बतौर अभिनेत्री नूरजहाँ की आखिरी फ़िल्म 'बाजी' थी, जो 1963 में प्रदर्शित हुई। उन्होंने पाकिस्तान में 14 फ़िल्में बनाई थीं, जिसमें 10 उर्दू फ़िल्में थीं। पारिवारिक दायित्वों के कारण उन्हें अभिनय को अलविदा करना पड़ा। हालाँकि, उन्होंने गायन जारी रखा। पाकिस्तान में पार्श्वगायिका के तौर पर उनकी पहली फ़िल्म 'जान-ए-बहार' (1958) थी। इस फ़िल्म का 'कैसा नसीब लाई' गाना काफ़ी लोकप्रिय हुआ।


पुरस्कार_व_सम्मान


नूरजहाँ ने अपने आधी शताब्दी से अधिक के फ़िल्मी कैरियर में उर्दू, पंजाबी और सिंधी आदि भाषाओं में कई गाने गाए। उन्हें मनोरंजन के क्षेत्र में पाकिस्तान के सर्वोच्च सम्मान 'तमगा-ए-इम्तियाज' से सम्मानित किया गया था।


⚰️मृत्यु


अपनी दिलकश आवाज़ और अदाओं से दर्शकों को मदहोश कर देने वाली नूरजहाँ का दिल का दौरा पड़ने से 23 दिसम्बर, 2000 को निधन हुआ। वर्ष 1996 में ही नूरजहाँ आवाज़ की दुनिया से जुदा हो गई थीं। 1996 में प्रदर्शित एक पंजाबी फ़िल्म 'सखी बादशाह' में उन्होंने अपना अंतिम गाना गाया था। नूरजहाँ ने अपने संपूर्ण फ़िल्मी कैरियर में लगभग एक हज़ार गाने गाए।


रोचक_तथ्य


सन 2000 में जब नूरजहाँ की मौत हुई, तो उनकी एक बुज़ुर्ग चाची ने कहा था- "जब नूर पैदा हुई थी तो उनके रोने की आवाज़ सुनकर उनकी बुआ ने उनके पिता से कहा था कि यह लड़की तो रोती भी सुर में है।"

नूरजहाँ के बारे में एक और कहानी भी मशहूर है। तीस के दशक में एक बार लाहौर में एक स्थानीय पीर के भक्तों ने उनके सम्मान में भक्ति संगीत की एक ख़ास शाम का आयोजन किया था। एक लड़की ने वहाँ पर कुछ नात सुनाए। पीर ने उस लड़की से कहा- "बेटी कुछ पंजाबी में भी हमको सुनाओ।" उस लड़की ने तुरंत पंजाबी में तान ली, जिसका आशय कुछ इस तरह का था- "इस पाँच नदियों की धरती की पतंग आसमान तक पहुँचे।" जब वह लड़की यह गीत गा रही थी, तो पीर अवचेतन की अवस्था में चले गए। थोड़ी देर बाद वह उठे और लड़की के सिर पर हाथ रख कर कहा- "लड़की तेरी पतंग भी एक दिन आसमान को छुएगी।"
नूरजहाँ को दावतों के बाद या लोगों की फ़रमाइश पर गाना सख़्त नापसंद था। एक बार दिल्ली के विकास पब्लिशिंग हाउस के प्रमुख नरेंद्र कुमार उनसे मिलने लाहौर गए। उनके साथ उनका किशोर बेटा भी था। यकायक नरेंद्र ने मैडम से कहा- "मैं अपने बेटे के लिए आपसे कुछ माँगना चाह रहा हूँ, क्योंकि मैं चाहता हूँ कि वह इस क्षण को ताज़िंदगी याद रखे। सालों बाद वह लोगों से कह सके कि एक सुबह वह एक कमरे में नूरजहाँ के साथ बैठा था और नूरजहाँ ने उसके लिए एक गाना गाया था।" वहाँ उपस्थित लोगों की सांसे रुक गईं, क्योंकि उन्हें पता था कि नूरजहाँ ऐसा कभी कभार ही करती हैं। नूरजहाँ ने पहले नरेंद्र को देखा, फिर उनके पुत्र को और फिर अपने उस्ताद ग़ुलाम मोहम्मद उर्फ़ ग़म्मे ख़ाँ को। 'ज़रा बाजा तो मँगवाना', उन्होंने उस्ताद से कहा। एक लड़का बग़ल के कमरे से बाजा यानी हारमोनियम उठा लाया। उन्होंने नरेंद्र से पूछा क्या

गाऊँ? नरेंद्र को कुछ नहीं सूझा। किसी ने कहा 'बदनाम मौहब्बत कौन करे गाइए'। नूरजहाँ के चेहरे पर जैसे नूर आ गया। उन्होंने मुखड़ा गाया और फिर बीच में रुक कर नरेंद्र से कहा- "नरेंद्र साहब, आपको पता है, इस देश में ढंग का हारमोनियम नहीं मिलता। सिर्फ़ कोलकाता में अच्छा हारमोनियम मिलता है। यह सभी लोग भारत जाते हैं, बाजे लाते हैं और मुझे उनके बारे में बताते हैं, लेकिन..... टूटपैने मेरे लिए कोई हारमोनियम नहीं लाता।
दुनिया के किसी भी कोने में 'मैडम' शब्द का जो भी अर्थ लगाया जाता हो, किंतु पाकिस्तान में यह शब्द सिर्फ़ 'मल्लिका-ए-तरन्नुम' नूरजहाँ के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
जब नूरजहाँ को दिल का दौरा पड़ा, तो उनके एक मुरीद और नामी पाकिस्तानी पत्रकार ख़ालिद हसन ने लिखा था- "दिल का दौरा तो उन्हें पड़ना ही था। पता नहीं कितने दावेदार थे उसके, और पता नहीं कितनी बार वह धड़का था, उन लोगों के लिए जिन पर मुस्कराने की इनायत उन्होंने की थी।"

🎥
🎬 भारत में फिल्मोग्राफी 

1935 शीला 
1939 
गुल बकावली,
 इमानदार 
और प्याम-ए-हक 
1940 सजनी 
और यमला जाट 
1941 
चौधरी,
 रेड सिग्नल, 
उम्मीद 
 सुसराल 
1942 
चांदनी, 
धीरज, 
फरियाद
खानदान 
1943 
नादान,
 दुहाई और नौकर 
1944 
लाल हवेली 
 दोस्त 
1945 
ज़ीनत, 
गाँव की गोरी, 
बड़ी माँ 
 भाई जान 
1946 
अनमोल घड़ी,
 दिल, 
हमजोली,
 सोफिया 
 महाराणा प्रताप 
1947 
मिर्ज़ा साहिबान, 
जुगनू, 
आबिदा और मीराबाई 


🎬 पाकिस्तान में 
- 1951 चैन वे - पाकिस्तान में पहली फिल्म, सबसे बड़ी हिट  
वर्ष 1952 दोपट्टा - पाकिस्तान में वर्ष की सबसे बड़ी हिट 
1953  गुलनार 
1955 पते खां 
1956 लक्त-ए-जिगर 
और इंतजार 
1957 नूरां 
1958 छू मंतर 
और अनारकली 
1959 
नींद, 
परदाइसां और कोयल 
1961 मिर्जा गालिब 
1994 डंडा पीर 
1996 बांध मस्त कलंदर/आलमी गुंडे,

सीता राम की अग्नि परीक्षा

सीता माता की अग्नि परीक्षा की तो बहुत चर्चा होती है पर मर्यादा पुरुषोत्तम कहलवाने वाले राम की कितनी अग्नि परीक्षाएं हुई जानते तो...