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Sunday, September 20, 2026

मालिका तरनूम(जनम)

नूरजहाँ 🎂जन्म 21 सितम्बर, 1926 ⚰️23 दिसम्बर, 2000 
महान गायिका मल्लिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ 
🎂जन्म 21 सितम्बर, 1926 ई.
⚰️23 दिसम्बर, 2000 

नूरजहाँ 'भारतीय सिनेमा' की ख्याति प्राप्त अभिनेत्री और पार्श्वगायिकाओं में से एक थीं। उनका वास्तविक नाम 'अल्ला वसई' था। दक्षिण एशिया की महानतम गायिकाओं में शुमार की जाने वाली 'मल्लिका-ए-तरन्नुम' नूरजहाँ को लोकप्रिय संगीत में क्रांति लाने और पंजाबी लोकगीतों को नया आयाम देने का श्रेय जाता है। उनकी गायकी में वह जादू था कि हर उदयमान गायक की प्रेरणा स्रोत स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर ने भी जब अपने कॅरियर का आगाज किया तो उन पर नूरजहाँ की गायकी का प्रभाव था। नूरजहाँ अपनी आवाज़ में नित्य नए प्रयोग किया करती थीं। अपनी इन खूबियों की वजह से ही वे ठुमरी गायिकी की महारानी कहलाने लगी थीं।
जन्म_तथा_शिक्षा
नूरजहाँ का जन्म 21 सितम्बर, 1926 ई. को ब्रिटिश भारत में पंजाब के 'कसूर' नामक स्थान पर एक मुस्लिम परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम 'मदद अली' था और माता 'फ़तेह बीबी' थीं। नूरजहाँ के पिता पेशेवर संगीतकार थे। माता-पिता की ग्यारह संतानों में से नूरजहाँ एक थीं।संगीतकारों के परिवार में जन्मी नूरजहाँ को बचपन से ही संगीत के प्रति गहरा लगाव था। नूरजहाँ ने पाँच-छह साल की उम्र से ही गायन शुरू कर दिया था। वे किसी भी लोकगीत को सुनने के बाद उसे अच्छी तरह याद कर लिया करती थीं। इसको देखते हुए उनकी माँ ने उन्हें संगीत का प्रशिक्षण दिलाने का इंतजाम किया। उस दौरान उनकी बहन 'आइदान' पहले से ही नृत्य और गायन का प्रशिक्षण ले रही थीं।

फ़िल्मों_में_प्रवेश


तत्कालीन समय में कलकत्ता, वर्तमान कोलकाता थिएटर का गढ़ हुआ करता था। वहाँ अभिनय करने वाले कलाकारों, पटकथा लेखकों आदि की काफ़ी माँग थी। इसी को ध्यान में रखकर नूरजहाँ का परिवार 1930 के दशक के मध्य में कलकत्ता चला आया। जल्द ही नूरजहाँ और उनकी बहन को वहाँ नृत्य और गायन का अवसर मिल गया। नूरजहाँ की गायकी से प्रभावित होकर संगीतकार ग़ुलाम हैदर ने उन्हें के. डी. मेहरा की पहली पंजाबी फ़िल्म 'शीला' उर्फ 'पिंड दी कुड़ी' में उन्हें बाल कलाकार की संक्षिप्त भूमिका दिलाई। वर्ष 1935 में रिलीज हुई यह फ़िल्म पूरे पंजाब में हिट रही। इसने 'पंजाबी फ़िल्म उद्योग' की स्थापना का मार्ग प्रशस्त कर दिया। फ़िल्म के गीत बहुत हिट रहे।

सफलता_व_विवाह
1930 के दशक के उत्तरार्ध तक लाहौर में कई स्टूडियो अस्तित्व में आ गए थे। गायकों की बढ़ती माँग को देखते हुए नूरजहाँ का परिवार 1937 में लाहौर आ गया। डलसुख एल पंचोली ने बेबी नूरजहाँ को सुना और 'गुल-ए-बकवाली' फ़िल्म में उन्हें भूमिका दी। यह फ़िल्म भी काफ़ी हिट रही और गीत भी बहुत लोकप्रिय हुए। इसके बाद उनकी 'यमला जट' (1940), 'चौधरी' फ़िल्म प्रदर्शित हुई। इनके गाने 'कचियाँ वे कलियाँ ना तोड़' और 'बस बस वे ढोलना कि तेरे नाल बोलना' बहुत लोकप्रिय हुए। वर्ष 1942 में नूरजहाँ ने अपने नाम से 'बेबी' शब्द हटा दिया। इसी साल उनकी फ़िल्म 'खानदान' आई, जिसमें पहली बार उन्होंने लोगों का ध्यान आकर्षित किया। इसी फ़िल्म के निर्देशक शौक़त हुसैन रिज़वी के साथ उन्होंने विवाह कर लिया। बाद के समय में नूरजहाँ ने अपने से दस वर्ष छोटे 'एजाज दुर्रानी' से विवाह किया।

मुम्बई_आगमन


वर्ष 1943 में नूरजहाँ मुम्बई चली आईं। महज चार साल की संक्षिप्त अवधि के भीतर वे अपने सभी समकालीनों से काफ़ी आगे निकल गईं। भारत और पाकिस्तान दोनों जगह के पुरानी पीढ़ी के लोग उनकी क्लासिक फ़िल्मों 'लाल हवेली'’ 'जीनत', 'बड़ी माँ', 'गाँव की गोरी' और 'मिर्जा साहिबाँ' फ़िल्मों के आज भी दीवाने हैं। फ़िल्म 'अनमोल घड़ी' का संगीत अपने समय के ख्यातिप्राप्त संगीतकार नौशाद ने दिया था। उसके गीत 'आवाज दे कहाँ है', 'जवाँ है मोहब्बत' और 'मेरे बचपन के साथी' जैसे गीत आज भी लोगों की जुबाँ पर हैं।


लाहौर_प्रस्थान


नूरजहाँ देश के विभाजन के बाद अपने पति शौक़त हुसैन रिज़वी के साथ बंबई छोड़कर लाहौर चली गईं। लाहौर में रिजवी ने एक स्टूडियो का अधिग्रहण किया और वहाँ 'शाहनूर स्टूडियो' की शुरुआत की। 'शाहनूर प्रोडक्शन' ने फ़िल्म 'चन्न वे' (1950) का निर्माण किया, जिसका निर्देशन नूरजहाँ ने किया। यह फ़िल्म बेहद सफल रही। इसमें 'तेरे मुखड़े पे काला तिल वे' जैसे लोकप्रिय गाने थे। उनकी पहली उर्दू फ़िल्म 'दुपट्टा'’ थी। इसके गीत 'चाँदनी रातें...चाँदनी रातें' आज भी लोगों की जुबाँ पर हैं।


देश के विभाजन के बाद जहाँ एक तरफ़ ए. आर. कारदार और महबूब ख़ान जैसे कलाकार यहीं रह गए, वहीं बहुत-से ऐसे कलाकार भी थे, जिन्हें पाकिस्तान चले जाना पड़ा था। नूरजहाँ भी इनमें से एक थीं। भारत छोड़ पाक़िस्तान जा बसने की उनकी मजबूरी के बारे में उन्होंने 'विविध भारती' में बताया था कि- "आपको ये सब तो मालूम है, ये सबों को मालूम है कि कैसी नफ़सा-नफ़सी थी, जब मैं यहाँ से गई। मेरे


मियाँ मुझे ले गए और मुझे उनके साथ जाना पड़ा, जिनका नाम सैय्यद शौक़त हुसैन रिज़वी है। उस वक़्त अगर मेरा बस चलता तो मैं उन्हें समझा सकती, कोई भी अपना घर उजाड़ कर जाना तो पसन्द नहीं करता, हालात ऐसे थे कि मुझे जाना पड़ा। और ये आप नहीं कह सकते कि आप लोगों ने मुझे याद रखा और मैंने नहीं रखा, अपने-अपने हालात ही की बिना पे होता है किसी-किसी का वक़्त निकालना, और बिलकुल यकीन करें, अगर मैं सबको भूल जाती तो मैं यहाँ कैसे आती?"

पाकिस्तान स्थानान्तरित हो जाने से पहले नूरजहाँ के अभिनय व गायन से सजी दो फ़िल्में 1947 में प्रदर्शित हुई थीं- 'जुगनू' और 'मिर्ज़ा साहिबाँ'। 'जुगनू' शौक़त हुसैन रिज़वी की फ़िल्म थी 'शौक़त आर्ट प्रोडक्शन्स' के बैनर तले निर्मित, जिसमें नूरजहाँ के नायक दिलीप कुमार थे। संगीतकार फ़िरोज़ निज़ामी ने मोहम्मद रफ़ी और नूरजहाँ से एक ऐसा डुएट गीत इस फ़िल्म में गवाया, जो इस जोड़ी का सबसे ज़्यादा मशहूर डुएट सिद्ध हुआ। गीत था "यहाँ बदला वफ़ा का बेवफ़ाई के सिवा क्या है, मोहब्बत करके भी देखा, मोहब्बत में भी धोखा है"। इस गीत की अवधि क़रीब 5 मिनट और 45 सेकण्ड्स की थी, जो उस ज़माने के लिहाज़ से काफ़ी लम्बी थी। कहते हैं कि इस गीत को शौक़त हुसैन रिज़वी ने ख़ुद ही लिखा था, पर 'हमराज़ गीत कोश' के अनुसार फ़िल्म के गीत एम. जी. अदीब और असगर सरहदी ने लिखे थे।


📽️प्रमुख_फ़िल्में


1. यमला जट 1940 

2. रेड सिग्नल 1941
3. सुसराल 1941 
4. खानदान 1942
5. नादान 1943 
6. दुहाई 1943
7. लाल हवेली 1944 
8. गाँव की गोरी 1945
9. बड़ी माँ 1945 
10. भाईजान 1945
11. अनमोल घड़ी 1946 
12. जादूगर 1946
13. जुगनू 1947 
14. चनवे 1951
15. दुपट्टा 1952 
16. गुलनार 1953
17. फ़तेह ख़ान 1955 
18. इंतज़ार 1956
19. लख़्त-ए-जिगर 1956 
20. अनारकली 1958
21. छूमंतर 1958 
22. परदेशियाँ 1959
23. कोयल 1959 
24. मिर्ज़ा गालिब 1961

अंतिम_फ़िल्म


बतौर अभिनेत्री नूरजहाँ की आखिरी फ़िल्म 'बाजी' थी, जो 1963 में प्रदर्शित हुई। उन्होंने पाकिस्तान में 14 फ़िल्में बनाई थीं, जिसमें 10 उर्दू फ़िल्में थीं। पारिवारिक दायित्वों के कारण उन्हें अभिनय को अलविदा करना पड़ा। हालाँकि, उन्होंने गायन जारी रखा। पाकिस्तान में पार्श्वगायिका के तौर पर उनकी पहली फ़िल्म 'जान-ए-बहार' (1958) थी। इस फ़िल्म का 'कैसा नसीब लाई' गाना काफ़ी लोकप्रिय हुआ।


पुरस्कार_व_सम्मान


नूरजहाँ ने अपने आधी शताब्दी से अधिक के फ़िल्मी कैरियर में उर्दू, पंजाबी और सिंधी आदि भाषाओं में कई गाने गाए। उन्हें मनोरंजन के क्षेत्र में पाकिस्तान के सर्वोच्च सम्मान 'तमगा-ए-इम्तियाज' से सम्मानित किया गया था।


⚰️मृत्यु


अपनी दिलकश आवाज़ और अदाओं से दर्शकों को मदहोश कर देने वाली नूरजहाँ का दिल का दौरा पड़ने से 23 दिसम्बर, 2000 को निधन हुआ। वर्ष 1996 में ही नूरजहाँ आवाज़ की दुनिया से जुदा हो गई थीं। 1996 में प्रदर्शित एक पंजाबी फ़िल्म 'सखी बादशाह' में उन्होंने अपना अंतिम गाना गाया था। नूरजहाँ ने अपने संपूर्ण फ़िल्मी कैरियर में लगभग एक हज़ार गाने गाए।


रोचक_तथ्य


सन 2000 में जब नूरजहाँ की मौत हुई, तो उनकी एक बुज़ुर्ग चाची ने कहा था- "जब नूर पैदा हुई थी तो उनके रोने की आवाज़ सुनकर उनकी बुआ ने उनके पिता से कहा था कि यह लड़की तो रोती भी सुर में है।"

नूरजहाँ के बारे में एक और कहानी भी मशहूर है। तीस के दशक में एक बार लाहौर में एक स्थानीय पीर के भक्तों ने उनके सम्मान में भक्ति संगीत की एक ख़ास शाम का आयोजन किया था। एक लड़की ने वहाँ पर कुछ नात सुनाए। पीर ने उस लड़की से कहा- "बेटी कुछ पंजाबी में भी हमको सुनाओ।" उस लड़की ने तुरंत पंजाबी में तान ली, जिसका आशय कुछ इस तरह का था- "इस पाँच नदियों की धरती की पतंग आसमान तक पहुँचे।" जब वह लड़की यह गीत गा रही थी, तो पीर अवचेतन की अवस्था में चले गए। थोड़ी देर बाद वह उठे और लड़की के सिर पर हाथ रख कर कहा- "लड़की तेरी पतंग भी एक दिन आसमान को छुएगी।"
नूरजहाँ को दावतों के बाद या लोगों की फ़रमाइश पर गाना सख़्त नापसंद था। एक बार दिल्ली के विकास पब्लिशिंग हाउस के प्रमुख नरेंद्र कुमार उनसे मिलने लाहौर गए। उनके साथ उनका किशोर बेटा भी था। यकायक नरेंद्र ने मैडम से कहा- "मैं अपने बेटे के लिए आपसे कुछ माँगना चाह रहा हूँ, क्योंकि मैं चाहता हूँ कि वह इस क्षण को ताज़िंदगी याद रखे। सालों बाद वह लोगों से कह सके कि एक सुबह वह एक कमरे में नूरजहाँ के साथ बैठा था और नूरजहाँ ने उसके लिए एक गाना गाया था।" वहाँ उपस्थित लोगों की सांसे रुक गईं, क्योंकि उन्हें पता था कि नूरजहाँ ऐसा कभी कभार ही करती हैं। नूरजहाँ ने पहले नरेंद्र को देखा, फिर उनके पुत्र को और फिर अपने उस्ताद ग़ुलाम मोहम्मद उर्फ़ ग़म्मे ख़ाँ को। 'ज़रा बाजा तो मँगवाना', उन्होंने उस्ताद से कहा। एक लड़का बग़ल के कमरे से बाजा यानी हारमोनियम उठा लाया। उन्होंने नरेंद्र से पूछा क्या

गाऊँ? नरेंद्र को कुछ नहीं सूझा। किसी ने कहा 'बदनाम मौहब्बत कौन करे गाइए'। नूरजहाँ के चेहरे पर जैसे नूर आ गया। उन्होंने मुखड़ा गाया और फिर बीच में रुक कर नरेंद्र से कहा- "नरेंद्र साहब, आपको पता है, इस देश में ढंग का हारमोनियम नहीं मिलता। सिर्फ़ कोलकाता में अच्छा हारमोनियम मिलता है। यह सभी लोग भारत जाते हैं, बाजे लाते हैं और मुझे उनके बारे में बताते हैं, लेकिन..... टूटपैने मेरे लिए कोई हारमोनियम नहीं लाता।
दुनिया के किसी भी कोने में 'मैडम' शब्द का जो भी अर्थ लगाया जाता हो, किंतु पाकिस्तान में यह शब्द सिर्फ़ 'मल्लिका-ए-तरन्नुम' नूरजहाँ के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
जब नूरजहाँ को दिल का दौरा पड़ा, तो उनके एक मुरीद और नामी पाकिस्तानी पत्रकार ख़ालिद हसन ने लिखा था- "दिल का दौरा तो उन्हें पड़ना ही था। पता नहीं कितने दावेदार थे उसके, और पता नहीं कितनी बार वह धड़का था, उन लोगों के लिए जिन पर मुस्कराने की इनायत उन्होंने की थी।"

🎥
🎬 भारत में फिल्मोग्राफी 

1935 शीला 
1939 
गुल बकावली,
 इमानदार 
और प्याम-ए-हक 
1940 सजनी 
और यमला जाट 
1941 
चौधरी,
 रेड सिग्नल, 
उम्मीद 
 सुसराल 
1942 
चांदनी, 
धीरज, 
फरियाद
खानदान 
1943 
नादान,
 दुहाई और नौकर 
1944 
लाल हवेली 
 दोस्त 
1945 
ज़ीनत, 
गाँव की गोरी, 
बड़ी माँ 
 भाई जान 
1946 
अनमोल घड़ी,
 दिल, 
हमजोली,
 सोफिया 
 महाराणा प्रताप 
1947 
मिर्ज़ा साहिबान, 
जुगनू, 
आबिदा और मीराबाई 


🎬 पाकिस्तान में 
- 1951 चैन वे - पाकिस्तान में पहली फिल्म, सबसे बड़ी हिट  
वर्ष 1952 दोपट्टा - पाकिस्तान में वर्ष की सबसे बड़ी हिट 
1953  गुलनार 
1955 पते खां 
1956 लक्त-ए-जिगर 
और इंतजार 
1957 नूरां 
1958 छू मंतर 
और अनारकली 
1959 
नींद, 
परदाइसां और कोयल 
1961 मिर्जा गालिब 
1994 डंडा पीर 
1996 बांध मस्त कलंदर/आलमी गुंडे,

Wednesday, October 22, 2025

प्रयागराज(मृत्यु)

प्रयाग राज 23 सितंबर 2023
बच्चे: राहुल राज, आदित्य राज
भारतीय सिनेमा के जाने-माने पटकथा लेखक प्रयाग राज को उनकी पुण्यतिथि पर याद करते हुए: श्रद्धांजलि 

प्रयाग राज लंबे समय से फिल्म इंडस्ट्री में एक बड़ा नाम रहे हैं। उन्होंने अभिनय, लेखन, गायन, रचना, निर्देशन आदि सहित लगभग हर क्षेत्र में हाथ आजमाया। उन्होंने न केवल भारतीय फिल्में की हैं, बल्कि वे कुछ अंतर्राष्ट्रीय फिल्मों का भी हिस्सा रहे हैं। उन्हें थिएटर और टेलीविज़न में काम करना भी पसंद था, जैसा कि उनके लंबे करियर में स्पष्ट है। उनका जन्म इलाहाबाद में हुआ था, जो पूर्वी उत्तर प्रदेश का शहर है, और इसका नाम शहर के नाम पर पड़ा। उनके पिता, राम दास 'आज़ाद' अपने समय के जाने-माने कवि थे। जब वे छोटे थे, तब उनके पिता की मृत्यु हो गई, और इसलिए उन्होंने अपने परिवार की आर्थिक मदद करने के लिए काम करना शुरू कर दिया। वे मुंबई में पृथ्वी थिएटर के लिए काम करते थे और साथ ही अपनी शिक्षा भी जारी रखते थे।  प्रयाग राज प्रयाग राज (जन्म 1935 - 23 सितंबर 2023) बॉलीवुड में कहानी और पटकथा लेखक, अभिनेता, सेकंड असिस्टेंट डायरेक्टर थे। वे लंबे समय से फिल्म उद्योग में एक बड़ा नाम रहे हैं। उन्होंने अभिनय, लेखन, गायन, रचना, निर्देशन आदि सहित लगभग हर क्षेत्र में अपना हाथ आजमाया। उन्होंने न केवल भारतीय फिल्में की हैं, बल्कि वे कुछ अंतर्राष्ट्रीय फिल्मों का भी हिस्सा रहे हैं। उन्हें थिएटर और टेलीविज़न में काम करना भी पसंद था, जैसा कि उनके लंबे करियर में स्पष्ट है। एक लेखक के रूप में उन्होंने 100 से अधिक फ़िल्में लिखीं।  सुरेश सरवैया द्वारा संकलित

प्रयाग राज ने अपने करियर की शुरुआत फ़िल्म "फूल बने अंगारे (1963) से संवाद लेखक के रूप में की थी। निर्देशक के रूप में उनकी पहली फ़िल्म "कुंदन" (1972) थी। एक बाल कलाकार के रूप में, उन्होंने राज कपूर की "आग" (1948) में अभिनय किया है। अतिरिक्त पटकथा लेखक के रूप में उनकी आखिरी फ़िल्म "दीवाना मस्ताना" (1997) है।

प्रयाग राज का जन्म इलाहाबाद, संयुक्त प्रांत, अविभाजित भारत में हुआ था, जो अब उत्तर प्रदेश में प्रयाग राज है। उनका पूरा नाम प्रयाग राज शर्मा है और इसका नाम शहर प्रयाग राज के नाम पर पड़ा। उनके पिता, राम दास 'आज़ाद' अपने समय के जाने-माने कवि थे। जब वे छोटे थे, तब उनके पिता की मृत्यु हो गई और इसलिए उन्होंने अपने परिवार की आर्थिक मदद करने के लिए काम करना शुरू कर दिया। वे बॉम्बे (मुंबई) में पृथ्वी थिएटर के लिए काम करते थे। पृथ्वी थिएटर के साथ अपने 16 साल के लंबे जुड़ाव के दौरान, वे नाटक लिखते और निर्देशित करते थे। वे अलग-अलग तरह की भूमिकाएँ निभाते थे।  मंच पर और मंच के बाहर भी। लंबे समय तक वे राज, शम्मी और शशि कपूर के अंडरस्टडी रहे। वे शाम को एम. सादिक और लेख टंडन जैसे फिल्म निर्माताओं के अंडरस्टडी भी करते थे। उन्होंने अपनी शिक्षा भी जारी रखी।

प्रयाग राज ने एक सीडी बनाई है, जिसमें उन्होंने 1940 के दशक के पृथ्वी थियेटर्स के नाटकों में रिकॉर्ड की गई धुनों को रिकॉर्ड किया है। सीडी का नाम "पृथ्वी थियेटर्स के नाटकों के यादगार गीत" रखा गया है, जिसमें धुनों के नोटेशन और इंटरल्यूड्स में कुछ बदलाव किए गए हैं।

प्रयाग राज ने रुबिया खातून से शादी की। शादी के बाद उनका नाम बदलकर पुष्पा रख दिया गया। उनके दो बेटे आदित्य राज और राहुल राज हैं। राहुल फिल्म इंडस्ट्री में हैं और हॉलीवुड फिल्मों को हिंदी भाषा में डब करते हैं। आदित्य भी शुरुआत में सहायक निर्देशक के तौर पर इंडस्ट्री में थे, लेकिन बाद में उन्होंने इंडस्ट्री छोड़ने का फैसला किया।

शुरू में कुछ सालों तक संघर्ष करने के बाद प्रयाग राज को फिल्म इंडस्ट्री में अच्छी नौकरियां मिलनी शुरू हो गईं। पृथ्वी थियेटर्स बंद होने के बाद उन्होंने अभिनय करना शुरू किया। उनकी पहली फिल्में आग (1948) और आवारा (1951) थीं।  उन्हें अपना पहला लेखन कार्य 1963 की फ़िल्म "फूल बने अंगारे" में मिला।

अपने शुरुआती संघर्ष के दिनों में, प्रयाग राज से दोस्ती हुई, जिन्होंने उन्हें इस्माइल मर्चेंट और जेम्स आइवरी से मिलवाया। इस तिकड़ी ने कई फ़िल्में कीं, जिनमें मशहूर फ़िल्म "द हाउसहोल्डर" भी शामिल है, जिसके लिए उन्होंने हिंदी संवाद लिखे। उन्होंने 1965 में फ़िल्म "शेक्सपियर वाला" में इस्माइल मर्चेंट और जेम्स आइवरी के साथ काम किया। फ़िल्म पर काम करते हुए, उन्होंने "दिल धड़के..." नामक एक गीत की रचना और लेखन किया, जिसे फ़िल्म में शामिल किया गया। उन्हें इस गीत के लिए विशेष श्रेय भी दिया गया। उन्होंने कई सालों तक दोनों के साथ "कस्टडी" (1994) और "कॉटन मैरी" (1999) जैसी फ़िल्मों में काम किया। कॉटन मैरी फ़िल्म में, उन्होंने सेकंड यूनिट डायरेक्टर के तौर पर काम किया है।
निर्देशक के तौर पर प्रयाग राज ने पाप और पुण्य (1974), पोंगा पंडित (1975), चोर सिपाही (1977) जैसी कई फ़िल्में बनाईं। निर्देशक के तौर पर उनका कार्यकाल ज़्यादा लंबा नहीं चला क्योंकि फ़िल्में ज़्यादा सफल नहीं रहीं। लेकिन उन्होंने कई तरह के अभिनेताओं के लिए निर्देशन किया है। उन्होंने गुरुदेव, परवरिश (1977), रोटी, आ गले लग जा (1973) जैसी कई फ़िल्मों की पटकथाएँ भी लिखी हैं।  उन्होंने झुक गया आसमान (1968), धरम करम (1975), अमर अकबर एंथनी (1977), गंगा जमुना सरस्वती (1988) जैसी कई फ़िल्में लिखी हैं।

प्रयाग राज ने जब जब फूल खिले (1965), बॉम्बे टॉकी (1970), इन कस्टडी (1993), द गुरु (1969) में भी अभिनय किया है, उनकी पटकथा लेखन ने उन्हें फ़िल्म बिरादरी में एक पहचान दिलाई है। 1983 में उन्होंने लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की फ़िल्म 'कुली' के लिए आशा भोसले और शब्बीर कुमार के साथ 'एक्सीडेंट हो गया रब्बा रब्बा...' गाना भी गाया था। जंगली गाने में उन्होंने 'याहू...' की शुरुआत की थी। उन्होंने मर्द (1985) और अल्लाह रक्खा (1986) फ़िल्मों में संगीत निर्देशक अनु मलिक के साथ गीतकार के रूप में भी काम किया है।  वह एक अनुभवी और प्रेरक व्यक्तित्व थे जो बॉलीवुड के सबसे सफल पटकथा लेखकों में से एक थे।

प्रयाग राज, एक अनुभवी पटकथा लेखक, जिन्हें अमिताभ बच्चन की 'अमर अकबर एंथनी', 'नसीब', 'कुली' और कई अन्य फिल्मों में उनके योगदान के लिए जाना जाता है, का 23 सितंबर 2023 को 88 वर्ष की आयु में उनके बांद्रा स्थित आवास पर उम्र संबंधी बीमारियों के कारण निधन हो गया।
 1965 जब फूल खिले
1974 पाप और पुण्य
1983 कुली
1975 धरम करम 
1975 पोंगा पंडित
1989 गैर कानूनी
1985 गिरफ्तार
1987 हिफाजत
1986 अल्लाह रखा 
1974 इंसानियत
1977 चोर सिपाही 
1985 मर्द
1977 अमर अकबर एंथोनी
1979 सुहाग

Monday, September 29, 2025

दिप्ती भटनागर


दिप्ती भटनागर जन्म 30 सितंबर 1967 
दिप्ती भटनागर 
🎂जन्म 30 सितंबर 1967 

मेरठ , उत्तर प्रदेश , भारत
व्यवसायों
अभिनेत्री टेलीविज़न प्रस्तोता
जीवनसाथी-रणदीप आर्य
भटनागर का जन्म उत्तर प्रदेश के मेरठ में हुआ था । वह दिल्ली में स्कूल गईं और मेरठ विश्वविद्यालय में पढ़ीं । वह 1992 में उत्तर प्रदेश के मेरठ में अपनी हस्तशिल्प फैक्ट्री को बढ़ावा देने के लिए एक अच्छी विज्ञापन एजेंसी की पहचान करने के लिए मुंबई चली गईं
भटनागर ने अपने शो मुसाफिर हूं यारों के निर्देशक रणदीप आर्य से शादी की है । उनके दो बेटे हैं। 
📽️
2004 रोक सको तो रोक लो
2002 अग्नि वर्षा
2001 उलझन
2001 चोरी चोरी चुपके चुपके
1999 मान
1999 गंगा की कसम
1999 हम तुम पे मरते हैं
1999 दुल्हन बनूं मैं तेरी
1998 हिटलर 
1998 हमसे बढ़कर कौन
1997 कहार
1997 कालिया
1996 रजवाड़े
1995 राम शास्त्र
वगैरा वगैरा.........

इसी लेख के संदर्भ में 

दीप्ति भटनागर 30 सितंबर 1967

दीप्ति भटनागर दीप्ति भटनागर (जन्म 30 सितंबर 1967) एक भारतीय फिल्म अभिनेत्री और मॉडल हैं। उनकी पहली फिल्म भूमिका संजय गुप्ता की "राम शास्त्र" में आई थी, जिसमें जैकी श्रॉफ और मनीषा कोइराला भी थे। उनकी कुछ प्रसिद्ध कृतियों में तेलुगु फिल्म, पेली संददी, अमेरिकी फिल्म, इन्फर्नो और बॉलीवुड फिल्म, मन शामिल हैं। 

दीप्ति भटनागर का जन्म 30 सितंबर 1967 को मेरठ (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा दिल्ली से की और मेरठ विश्वविद्यालय में पढ़ाई की। वह 1992 में उत्तर प्रदेश के मेरठ में अपने हस्तशिल्प कारखाने को बढ़ावा देने के लिए एक अच्छी विज्ञापन एजेंसी की पहचान करने के लिए मुंबई चली गईं।

 1992 में, दीप्ति भटनागर मुंबई में अपने हस्तशिल्प का प्रचार कर रही थीं, जब उन्हें रूपमिलन साड़ियों के प्रेस विज्ञापन के लिए मॉडलिंग करने के लिए एक विज्ञापन एजेंसी के साथ अनुबंध करने का अवसर मिला और उस विज्ञापन के बाद उन्होंने 12 और अभियान साइन किए। उन्होंने हस्तशिल्प फैक्ट्री चलाने में अपनी रुचि छोड़ दी और पेशेवर मॉडलिंग की दुनिया में प्रवेश किया। उन्होंने 1990 में ईव्स वीकली प्रतियोगिता जीती। इसके तुरंत बाद, वह सिंगापुर में विभिन्न अंतरराष्ट्रीय फैशन शो के लिए मॉडलिंग कर रही थीं।

1998 में, दीप्ति भटनागर एक टेलीविज़न शो "ये है राज" में रूबी भाटिया की जगह एक सख्त पुलिस वाले की मुख्य भूमिका में नज़र आईं।

 2001 में, दीप्ति भटनागर ने धार्मिक यात्रा गाइड शो 'यात्रा' और दुनिया भर की यात्रा गाइड शो 'मुसाफ़िर हूँ यारों' के साथ टेलीविज़न प्रोडक्शन में कदम रखा, दोनों ही स्टार प्लस पर प्रसारित हुए। उन्होंने दोनों शो की मेजबानी भी की। उन्होंने 'मुसाफ़िर हूँ यारों' के लिए 6 वर्षों में लगभग 80 देशों का दौरा किया।

दीप्ति भटनागर ने अपनी खुद की प्रोडक्शन कंपनी, दीप्ति भटनागर प्रोडक्शंस शुरू की, जिसमें डबिंग, एडिटिंग और पोस्ट प्रोडक्शन की सुविधाएँ हैं।

दीप्ति भटनागर ने अपने शो, 'मुसाफ़िर हूँ यारों' के निर्देशक रणदीप आर्य से शादी की है। उनके दो बेटे हैं, शुभ (जन्म 2003) और शिव (जन्म 2008)। दंपति एक संतुष्ट पारिवारिक जीवन का आनंद लेते हैं, अपने पेशेवर करियर को माता-पिता की खुशियों और जिम्मेदारियों के साथ संतुलित करते हैं।

💽 रिलीज़ हुए म्यूज़िक वीडियो -
▪️1996 में एल्बम लाल गरारा लाल गरारा म्यूज़िक वीडियो हंस राज हंस के साथ
▪️1996 में  वर्ष 2000 एल्बम - डांस अटैक - जिसमें चेशायर कैट और मेरा लौंग गवाचा (रीमिक्स) अन्य बूटेड - बल्ली सागू शामिल हैं। 

 🎬 फिल्मोग्राफी - 
1995 राम शास्त्र: रितु
 1996 पेली संदादी: स्वप्ना (तेलुगु फिल्म) 
1997 धर्म चक्रम: विजयलक्ष्मी (तमिल) कालिया: कालीचरण की पत्नी कहार: सपना इन्फर्नो शालीमार: ऑपरेशन कोबरा 
1998 ऑटो ड्राइवर: श्रावणी (तेलुगु फिल्म) हमसे बढ़कर कौन: वेनी दुल्हन बानो मैं तेरी: राधारानी सुल्तान: वंदना (तेलुगु फिल्म ) कामा: तमिल, तेलुगु, हिंदी फिल्म 
1999 मन: अनीता सिंघानिया
 2000 गैलाटे अलियांड्रू: डांसर (कन्नड़) मां: अन्नय्या  (तेलुगु फिल्म) 2001 चोरी चोरी चुपके चुपके: घोड़ भराई समारोह में डांसर
 2001 उलझन: अंजलि माथुर
 2002 कोंडावेती सिम्हासनम (तेलुगु) अग्नि वर्षा: डांसर (गाना 'चल रे साजन...') 
2004 रोक सको तो रोक लो: देव की भाभी 
2007 राकिलीपट्टू (मलयालम) 
2021 पेली सांडा डी: ओल्डर सहस्र - कैमियो (तेलुगु) 



 दीप्ति भटनागर (जन्म 30 सितंबर 1967) एक भारतीय फिल्म अभिनेत्री और मॉडल हैं। उनकी पहली फिल्म भूमिका संजय गुप्ता की "राम शास्त्र" में आई थी, जिसमें जैकी श्रॉफ और मनीषा कोइराला भी थे। उनकी कुछ प्रसिद्ध कृतियों में तेलुगु फिल्म, पेली संददी, अमेरिकी फिल्म, इन्फर्नो और बॉलीवुड फिल्म, मन शामिल हैं। 

दीप्ति भटनागर का जन्म 30 सितंबर 1967 को मेरठ (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा दिल्ली से की और मेरठ विश्वविद्यालय में पढ़ाई की। वह 1992 में उत्तर प्रदेश के मेरठ में अपने हस्तशिल्प कारखाने को बढ़ावा देने के लिए एक अच्छी विज्ञापन एजेंसी की पहचान करने के लिए मुंबई चली गईं।

 1992 में, दीप्ति भटनागर मुंबई में अपने हस्तशिल्प का प्रचार कर रही थीं, जब उन्हें रूपमिलन साड़ियों के प्रेस विज्ञापन के लिए मॉडलिंग करने के लिए एक विज्ञापन एजेंसी के साथ अनुबंध करने का अवसर मिला और उस विज्ञापन के बाद उन्होंने 12 और अभियान साइन किए। उन्होंने हस्तशिल्प फैक्ट्री चलाने में अपनी रुचि छोड़ दी और पेशेवर मॉडलिंग की दुनिया में प्रवेश किया। उन्होंने 1990 में ईव्स वीकली प्रतियोगिता जीती। इसके तुरंत बाद, वह सिंगापुर में विभिन्न अंतरराष्ट्रीय फैशन शो के लिए मॉडलिंग कर रही थीं।

1998 में, दीप्ति भटनागर एक टेलीविज़न शो "ये है राज" में रूबी भाटिया की जगह एक सख्त पुलिस वाले की मुख्य भूमिका में नज़र आईं।

 2001 में, दीप्ति भटनागर ने धार्मिक यात्रा गाइड शो 'यात्रा' और दुनिया भर की यात्रा गाइड शो 'मुसाफ़िर हूँ यारों' के साथ टेलीविज़न प्रोडक्शन में कदम रखा, दोनों ही स्टार प्लस पर प्रसारित हुए। उन्होंने दोनों शो की मेजबानी भी की। उन्होंने 'मुसाफ़िर हूँ यारों' के लिए 6 वर्षों में लगभग 80 देशों का दौरा किया।

दीप्ति भटनागर ने अपनी खुद की प्रोडक्शन कंपनी, दीप्ति भटनागर प्रोडक्शंस शुरू की, जिसमें डबिंग, एडिटिंग और पोस्ट प्रोडक्शन की सुविधाएँ हैं।

दीप्ति भटनागर ने अपने शो, 'मुसाफ़िर हूँ यारों' के निर्देशक रणदीप आर्य से शादी की है। उनके दो बेटे हैं, शुभ (जन्म 2003) और शिव (जन्म 2008)। दंपति एक संतुष्ट पारिवारिक जीवन का आनंद लेते हैं, अपने पेशेवर करियर को माता-पिता की खुशियों और जिम्मेदारियों के साथ संतुलित करते हैं।

💽 रिलीज़ हुए म्यूज़िक वीडियो -
▪️1996 में एल्बम लाल गरारा लाल गरारा म्यूज़िक वीडियो हंस राज हंस के साथ
▪️1996 में  वर्ष 2000 एल्बम - डांस अटैक - जिसमें चेशायर कैट और मेरा लौंग गवाचा (रीमिक्स) अन्य बूटेड - बल्ली सागू शामिल हैं। 

 🎬 फिल्मोग्राफी - 
1995 राम शास्त्र: रितु 
1996 पेली संदादी: स्वप्ना (तेलुगु फिल्म) 
1997 धर्म चक्रम: विजयलक्ष्मी (तमिल) कालिया: कालीचरण की पत्नी कहार: सपना इन्फर्नो शालीमार: ऑपरेशन कोबरा 
1998 ऑटो ड्राइवर: श्रावणी (तेलुगु फिल्म) हमसे बढ़कर कौन: वेनी दुल्हन बानो मैं तेरी: राधारानी सुल्तान: वंदना (तेलुगु फिल्म ) कामा: तमिल, तेलुगु, हिंदी फिल्म 
1999 मन: अनीता सिंघानिया 
2000 गैलाटे अलियांड्रू: डांसर (कन्नड़) मां: अन्नय्या  (तेलुगु फिल्म) 2001 चोरी चोरी चुपके चुपके: घोड़ भराई समारोह में डांसर 
2001 उलझन: अंजलि माथुर 
2002 कोंडावेती सिम्हासनम (तेलुगु) अग्नि वर्षा: डांसर (गाना 'चल रे साजन...') 2004 रोक सको तो रोक लो: देव की भाभी 2007 राकिलीपट्टू (मलयालम) 2021 पेली सांडा डी: ओल्डर सहस्र - कैमियो (तेलुग)

बीजू खोटे(मृत्यु)

विजु खोटे 
🎂17 दिसंबर 1941 ⚰️30 सितंबर 2019
 जन्म: 17 दिसंबर 1941, मुंबई मृत्यु: 30 सितंबर 2019 (उम्र 77 वर्ष), मुंबई बच्चे: माधवी खोटे चंद्रा 
भाई-बहन: शुभा खोटे 
माता-पिता: नंदू खोटे 
ऊंचाई: 1.79 मीटर
एक भारतीय अभिनेता थे, जिन्हें हिंदी और मराठी सिनेमा में 440 से अधिक फिल्मों में काम किया वह फिल्म शोले में डकैत कालिया के रूप में उनका संवाद "सरदार मैंने आपका नमक खाया है"  काफी प्रसिद्ध हुआ उन्हें आज भी इसी किरदार से जाना जाता है। बहुत ही कम लोगों को पता है कि इस रोल के लिए उन्हें 2500 रुपये फीस मिली थी।
फिल्म अंदाज़ अपना अपना में रॉबर्ट के किरदार में उनका संवाद "गलती से मिस्टेक हो गया" भी काफी प्रसिद्ध हुआ 
टेलीविजन पर उन्हें ज़बान संभाल के (1993) में उनकी भूमिका के लिए सबसे ज्यादा याद किया जाता है  उन्होंने वर्षों तक मराठी थिएटर में भी काम किया। 

वह अभिनेत्री शुभा खोटे के छोटे भाई थे।  उनके पिता नंदू खोटे एक प्रसिद्ध मंच कलाकार  और मूक फिल्मों के अभिनेता थे, जिनकी भाभी अभिनेत्री दुर्गा खोटे थीं। 
"सरकार, मैंने आपका नमक खाया है " (शोले)
"गलती से मिस्टेक हो गया " (अंदाज़ अपना अपना) उनके मशहूर डायलोग 
विजू खोटे का निधन 30 सितंबर 2019 को 77 वर्ष की आयु में मुंबई में हुआ।
📺
1993-1997 ज़बान संभालके विट्ठल बापूराव पोटे
1994 श्रीमान श्रीमती सेठिया (एपिसोड 17) काला कौवा (एपिसोड 28) अतिथि भूमिका
1997 घर जमाई मुत्तुस्वामी अतिथि भूमिका एपिसोड 18
1998 परिवार नं.1 आदित्य कपूर अतिथि
2002 सीआईडी एपिसोड 219 - एक दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना न्यायाधीश
🎥
2005 पहचान
2005 खुल्लम खुल्ला प्यार करें
2005 विरुद्ध
2005 गरम मसाला
2004 घर गृहस्थी
2004 फ़िदा
2004 दिल ने जिसे अपना कहा
2004 किस किस की किस्मत
2003 स्टम्पड
2002 तुमसे अच्छा कौन है चन्दर
2002 क्रांति
2002 शरारत
2002 हम किसी से कम नहीं
2001 इण्डियन

2000 हद कर दी आपने
2000 आगाज़ देशपांडे
2000 खिलाड़ी 420
2000 पुकार
1999 न्यायदाता
1999 जानवर
1998 डोली सजा के रखना
1998 चाइना गेट
1998 हमसे बढ़कर कौन
1998 अचानक
1998 घरवाली बाहरवाली
1997 सनम
1996 लोफर
1996 घातक
1996 विजेता
1995 किस्मत
1995 आशिक मस्ताने
1995 बरसात
1994 अंदाज़ अपना अपना
1994 जय किशन
1994 बेटा हो तो ऐसा
1994 आग
1993 वक्त हमारा है
1993 हम हैं कमाल के
1993 दामिनी
1993 आशिक आवारा
1993 बड़ी बहन
1993 शतरंज
1992 प्यार हुआ चोरी चोरी
1992 त्यागी
1992 खुले आम
1992 माँ
1992 दौलत की जंग
1992 दीदार
1992 हमशक्ल
1991 बेनाम बादशाह
1991 अफ़साना प्यार का
1991 लक्ष्मण रेखा चमन भाई
1991 डांसर
1991 त्रिनेत्र
1991 विश्णु देवा
1991 दो मतवाले
1991 कर्ज़ चुकाना है
1991 बंजारन
1991 फरिश्ते
1990 रोटी की कीमत
1990 गुनाहों का देवता
1990 प्यार का कर्ज़
1990 दिल
1990 थानेदार
1990 जवानी ज़िन्दाबाद
1990 खतरनाक
1990 घायल
1990 वर्दी
1990 चोर पे मोर
1990 प्यार का देवता
1989 कसम वर्दी की
1989 पाप का अंत
1989 मैं तेरा दुश्मन
1989 नाइंसाफी
1989 गैर कानूनी
1989 तौहीन
1989 दाता चोर
1988 पीछा करो
1988 कसम
1988 कंवरलाल
1988 पाप को जला कर राख कर दूँगा
1988 मर मिटेंगे
1988 प्यार का मंदिर
1987 परम धरम
1987 मजाल
1987 जलवा
1987 नाम-ओ-निशान
1986 शत्रु
1986 नगीना
1986 आखिरी रास्ता
1986 बात बन जाये
1986 दिलवाला
1986 आग और शोला
1986 तन बदन
1986 कर्मा
1985 यादों की कसम
1985 पाताल भैरवी
1985 मेरी जंग
1985 माँ कसम
1985 रामकली
1985 वफ़ादार
1985 हकीकत
1985 कर्मयुद्ध
1984 अंदर बाहर
1984 हसीयत
1984 रक्षा बंधन
1984 आज का एम एल ए 
1984 जवानी
1984 इंकलाब
1984 कसम पैदा करने वाले की
1984 हम रहे ना हम
1984 शराबी
1984 ज़ख्मी शेर
1984 झूठा सच
1983 सदमा
1983 नास्तिक
1983 पु्कार
1983 हमसे ना जीता कोई
1983 हम से है ज़माना
1983 अच्छा बुरा
1982 गोपीचन्द जासूस
1982 विधाता
1982 भागवत
1982 नमक हलाल
1982 हमारी बहू अलका
1982 कच्चे हीरे
1982 अशान्ति
1981 ज्योति
1981 सनसनी
1981 लावारिस
1981 जमाने को दिखाना है
1981 याराना
1981 रक्षा
1980 जल महल
1980 जज़बात
1980 कर्ज़
1980 एग्रीमेंट
1980 शान
1979 सरकारी मेहमान
1979 जाने-ए-बहार
1979 सुनयन
1979 गौतम गोविन्दा
1978 घर
1978 देवता
1978 आज़ाद
1978 अतिथि
1978 खून का बदला खून
1977 अलीबाबा मरज़ीना
1977 दुल्हन वही जो पिया मन भाये
1977 अगर
1977 परवरिश
1976 तपस्या
1976 महा चोर
1975 उलझन
1975 शोले
1975 वारंट
1975 मज़ाक
1974 हाथ की सफाई
1974 रोटी
1974 बेनाम
1973 शरीफ़ बदमाश
1972 शादी के बाद
1972 भाई हो तो ऐसा
1971 पारस
1970 पगला कहीं का
1970 सच्चा झूठा
1969 जीने की राह
1968 अनोखी रात

Sunday, September 28, 2025

कुणाल सिंह (जनम)

कुणाल सिंह 🎂29 सितम्बर  1976 ⚰️07 फरवरी 2008
कुणाल सिंह
29 सितम्बर 1976
हरियाणा , भारत
मृत
7 फरवरी 2008 (आयु 31)
मुंबई, महाराष्ट्र , भारत
पेशा
अभिनेता
सक्रिय वर्ष
1999–2008
संगठन
बालागिरी (फिल्म निर्माण कंपनी)
कुणाल सिंह (29 सितंबर 1976 - 7 फरवरी 2008), जिन्हें पेशेवर रूप से कुणाल के नाम से जाना जाता है , एक भारतीय अभिनेता थे जिन्होंने मुख्य रूप से तमिल सिनेमा में काम किया। उन्हें कथिर की कधलार धिनम (1999) में उनकी रोमांटिक भूमिका के लिए जाना जाता है , जो कुणाल की पहली फिल्म थी।

कुणाल का जन्म 29 सितंबर 1976 को हरियाणा , भारत में हुआ था । उन्हें कथिर की 1999 की रोमांटिक तमिल फिल्म कधलार धिनम में सोनाली बेंद्रे के साथ पेश किया गया था , जो उस समय की एक लोकप्रिय बॉलीवुड अभिनेत्री थीं। कुणाल ने एक युवा छात्र की भूमिका निभाई, जो इंटरनेट पर बेंद्रे के चरित्र से प्यार करता है। उत्तर भारत में बेंद्रे की लोकप्रियता के कारण, फिल्म को आंशिक रूप से फिर से शूट किया गया और हिंदी में दिल ही दिल में नाम से डब किया गया ।

कधलार धिनम की सापेक्ष सफलता के बाद , कुणाल पारवई ओन्ड्रे पोथुमे (2001) और पुन्नगई देसम (2002) जैसी सफल तमिल फिल्मों की एक श्रृंखला में दिखाई दिए , बाद वाली उनकी पहली मल्टी-स्टारर फिल्म थी।

वरुशामेलम वसंतम (2002) में मनोज के. भारती के साथ सह-अभिनय करने के बाद , कुणाल पेसाधा कन्नम पेसुम , एंगे एनाधु कविथाई और अनारचिगल जैसी कई फ्लॉप फिल्मों में दिखाई दिए । उनकी बाद की कई फ़िल्में शुरू हुईं और फिर बंद हो गईं, जैसे विजयालक्ष्मी के साथ नवा की निलाविनिला , सुज़ैन के साथ किमू किपी , और रितिक की कदालीथल आनंदम , जिसमें वह लिविंगस्टन और कौशल्या के साथ थे ।  इसके अलावा, दो फिल्में जो उन्होंने अभिनेत्री शेरिन श्रृंगार के साथ साइन की थीं , जय अदित्या की कधल थिरुदा और नंदा की थोडु , शूट की गईं और रिलीज़ नहीं हुईं। 

जब उन्हें अभिनेता के रूप में भूमिकाएँ नहीं मिलीं, तो उन्होंने कई फ़िल्मों में सहायक संपादक के रूप में काम किया और निर्माण की ओर रुख किया। कुणाल की आखिरी तमिल फ़िल्म ननबनिन कधाली थी , जो 2007 में रिलीज़ हुई थी

07 फरवरी 2008 को कुणाल अपने मुंबई अपार्टमेंट में छत से लटके पाए गए । स्पष्ट आत्महत्या को उनके पिता राजेंद्र सिंह ने चुनौती दी थी जिन्होंने दावा किया था कि शरीर पर संदिग्ध चोट के निशान थे। अभिनेत्री लवीना भाटिया को उनकी मौत के सिलसिले में पुलिस ने हिरासत में लिया था, लेकिन बाद में पुलिस द्वारा मकसद साबित नहीं कर पाने के बाद उन्हें छोड़ दिया गया था। पुलिस यह साबित नहीं कर पाई कि कुणाल की मौत के समय उनके अपार्टमेंट में कोई मौजूद था और भाटिया को संदिग्ध के रूप में खारिज कर दिया;  इसके अलावा, कुणाल ने कई महीने पहले अपनी कलाई काटकर आत्महत्या का प्रयास किया था। अपनी मृत्यु के समय, कुणाल एक हिंदी फिल्म योगी पर काम कर रहे थे , जिसका निर्माण उनकी नई बनी प्रोडक्शन कंपनी बालागिरी कर रही थी।  मामला सीबीआई और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के प्रोफेसर टीडी डोगरा को भेजा गया था

🎥1999 कधालर धिनम

2000 दिल ही दिल में हिंदी फ़िल्म; कधलार धिनम का आंशिक रूप से पुनः शूट किया गया संस्करण

2001 पारवई ओन्ड्रे पोथुमे
2002 
पुन्नगई देसम 
वरुशामेलम वसंतम 
पेसाधा कन्नुम पेसुमे 
एंजे एनाधु कविताई 
Arputham
2004 सुपर दा
2005 
देवथैयाइ कंदेन 
पेसुवोमा 
थिरुडिया इधायथै 
साधूरियाँ 
क्षमा करें एनाकु
 कल्याणमयिदिचू
2006 अनार्कीगल
2007 ननबनीन कधाली

शश धर मुखर्जी (जनम)

शशधर मुखर्जी 🎂29 सितंबर 1909⚰️03 नवंबर 1990
 शशधर मुखर्जी 
29 सितंबर 1909, झाँसी
मृत्यु की जगह और तारीख: 03 नवंबर 1990, मुम्बई
बच्चे: शोमू मुखर्जी, देब मुखर्जी, जॉय मुखर्जी, रोनो मुखर्जी · ज़्यादा देखें
पत्नी: सती रानी देवी (विवा. ?–1990)
भाई: रविन्द्रमोहन मुखर्जी, सुबोध मुखर्जी, प्रबोध मुखर्जी
पोते या नाती: काजोल, तनिशा मुखर्जी, अयान
शशधर मुखर्जी (29 सितंबर 1909 - 03 नवंबर 1990) हिंदी फिल्मों के एक प्रसिद्ध निर्माता थे। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत 1930 के दशक में बॉम्बे टॉकीज़ से की और बाद में राय बहादुर चुन्नीलाल, अशोक कुमार और ज्ञान मुखर्जी के साथ 1943 में फिल्मिस्तान स्टूडियो की स्थापना की। 1950 के दशक में उन्होंने अपना खुद का स्टूडियो, फिल्मालाया स्थापित किया। वह फिल्मों जैसे दिल देके देखो (1959), लव इन सिमला (1960), एक मुसाफिर एक हसीना (1962) और लीडर (1964) के लिए जाने जाते हैं।

उन्हें फिल्मफेयर अवार्ड फॉर बेस्ट फिल्म के लिए जगृति (1954) के लिए सम्मानित किया गया और बाद में 1967 में भारत सरकार द्वारा पद्म श्री से सम्मानित किया गया।

शशधर मुखर्जी का जन्म 29 सितंबर 1909 को झांसी, ग्वालियर राज्य, उत्तर प्रदेश में हुआ था। वह अशोक कुमार, अनूप कुमार और किशोर कुमार के साले थे, जिनकी बहन सती रानी से उनका विवाह हुआ था। वह अशोक कुमार को फिल्मों में लाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

उनके बच्चे रोनो मुखर्जी, जॉय मुखर्जी, देब मुखर्जी, शोमू मुखर्जी, शिबानी मौलिक नée मुखर्जी और सुबीर मुखर्जी हैं। शोमू ने अभिनेत्री तनुजा से विवाह किया और उनके दो बच्चे काजोल और तनिशा हैं। शशधर की परनाती अभिनेत्री रानी मुखर्जी हैं, जिनके दादा रवींद्रमोहन मुखर्जी शशधर के बड़े भाई थे।

उनके दो और भाई, फिल्म निर्देशक सुबोध मुखर्जी और फिल्म निर्माता प्रबोध मुखर्जी थे। उनके पोते, देब मुखर्जी के बेटे आयन मुखर्जी ने फिल्म "ये जवानी है दीवानी" (2013) का निर्देशन किया।

फिल्मिस्तान में उनकी पहली फिल्म "चल चल रे नौजवान" थी, जिसमें नसीम बानो और अशोक कुमार ने अभिनय किया था। सदत हसन मंटो, इस्मत चुगताई, पंडित प्रदीप और कई अन्य प्रतिभाशाली लोग फिल्मिस्तान से जुड़े हुए थे। फिल्मिस्तान ने शम्मी कपूर, देव आनंद और कई अन्य कलाकारों को मौका दिया और उन्हें स्टार बनाया।

शशधर मुखर्जी का निधन 03 नवंबर 1990 को बॉम्बे (अब मुंबई) में हुआ था। फिल्मालाया स्टूडियो के संस्थापक के रूप में, फिल्म "पथ्थर के इंसान" (1990) को शशधर मुखर्जी की याद में समर्पित किया गया था।

शशधर मुखर्जी की फिल्मोग्राफी:
माफ़ कीजिये, मैं आपको शशधर मुखर्जी की पूरी फिल्मोग्राफी प्रदान करने का प्रयास करता हूँ:

फिल्मोग्राफी:

1. कंगन (1939) - पटकथा लेखक और निर्माता
2. बंधन (1940) - कहानी लेखक
3. झूला (1941) - निर्माता
4. नया संसार (1941) - निर्माता
5. किस्मत (1943) - निर्माता
6. जगृति (1954) - निर्माता
7. मुनिमजी (1955) - निर्माता
8. तुमसा नहीं देखा (1957) - निर्माता
9. पेइंग गेस्ट (1957) - प्रस्तुति निर्माता
10. दिल देके देखो (1959) - निर्माता
11. लव इन सिमला (1960) - निर्माता
12. हम हिंदुस्तानी (1960) - निर्माता
13. एक मुसाफिर एक हसीना (1962) - निर्माता
14. लीडर (1964) - निर्माता
15. आओ प्यार करें (1964) - निर्माता
16. तू ही मेरी ज़िंदगी (1965) - निर्माता
17. संबंध (1966) - निर्माता
18. पत्थर के इंसान (1990) - समर्पित

अन्य जानकारी:

शशधर मुखर्जी ने फिल्मिस्तान स्टूडियो की स्थापना की और कई सफल फिल्मों का निर्माण किया। उन्होंने अपने बेटे जॉय मुखर्जी को फिल्मों में लॉन्च किया और कई अन्य कलाकारों को मौका दिया। वह एक प्रतिभाशाली निर्माता और पटकथा लेखक थे जिन्होंने हिंदी सिनेमा में महत्वपूर्ण योगदान दिया।फ़िल्मालय स्टूडियो के संस्थापक के रूप में, 1990 की फ़िल्म पत्थर के इंसान , शशधर मुखर्जी की स्मृति को समर्पित थी।पद्म श्री , भारत का चौथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान (1967)में दिया गया

Friday, September 26, 2025

यश चोपड़ा(जनम)

यश चोपड़ा
पूरा नाम यश राज चोपड़ा
अन्य नाम किंग ऑफ़ रोमांस
🎂जन्म 27 सितंबर, 1932
जन्म भूमि लाहौर पाकिस्तान
⚰️मृत्यु 21 अक्टूबर, 2012 
मृत्यु स्थान मुम्बई, महाराष्ट्र
पति/पत्नी पामेला चोपड़ा
संतान आदित्य चोपड़ा और उदय चोपड़ा
कर्म भूमि मुम्बई
कर्म-क्षेत्र निर्माता, निर्देशक, पटकथा लेखक
मुख्य फ़िल्में दीवार, दाग़, कभी कभी, डर, चांदनी, दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे, दिल तो पागल है, वीर जारा आदि।
पुरस्कार-उपाधि 11 बार फ़िल्मफेयर पुरस्कार, पद्म भूषण, दादा साहब फालके पुरस्कार
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी यश चोपड़ा के पुत्र आदित्य चोपड़ा प्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक और दूसरे पुत्र उदय चोपड़ा अभिनेता हैं।
अद्यतन‎ 
20:10, 28 सितम्बर 2012 (IST)
यश राज चोपड़ा (अंग्रेज़ी: Yash Raj Chopra, जन्म: 27 सितम्बर, 1932; मृत्यु: 21 अक्टूबर, 2012) भारतीय हिन्दी सिनेमा के प्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक, पटकथा लेखक एवं फ़िल्म निर्माता हैं। यश चोपड़ा को हिन्दी सिनेमा का “किंग ऑफ रोमांस” कहा जाता है। दीवार, कभी कभी, डर, चांदनी, सिलसिला, दिल तो पागल है, वीर जारा जैसी अनेकों बेहतरीन और रोमांटिक फ़िल्में बनाने वाले यश चोपड़ा ने पर्दे पर रोमांस और प्यार को नए मायने दिए हैं।

जीवन परिचय
यश चोपड़ा का जन्म 27 सितंबर, 1932 को लाहौर में हुआ था जो अब पाकिस्तान में है। स्वतंत्रता के बाद वह भारत आ गए। उनके बड़े भाई बी. आर. चोपड़ा बॉलीवुड के जाने-माने निर्माता निर्देशक थे। बड़े भाई की प्रेरणा पर ही उन्होंने भी फ़िल्मों में हाथ आजमाया और आज यश चोपड़ा का परिवार बॉलीवुड के प्रतिष्ठित बैनरों में से एक है। उनके बेटे आदित्य चोपड़ा और उदय चोपड़ा भी फ़िल्मों से ही जुड़े हुए हैं। यश चोपड़ा ने अपने भाई के साथ सह निर्देशक के तौर पर काम करना शुरू किया। अपने भाई बी. आर चोपड़ा के बैनर तले उन्होंने लगातार पांच फ़िल्में निर्देशित की। इन फ़िल्मों में ‘एक ही रास्ता’, ‘साधना’ और ‘नया दौर’ शामिल हैं।[१]

फ़िल्मी सफर
यश चोपड़ा ने 1959 में पहली बार अपने भाई के बैनर तले ही बनी फ़िल्म ‘धूल का फूल’ का निर्देशन किया। इसके बाद उन्होंने भाई के ही बैनर तले 'धर्म पुत्र' को भी निर्देशित किया। दोनों ही फ़िल्में औसत कामयाब रहीं पर इसमें यश चोपड़ा की मेहनत सबको नजर आई। वर्ष 1965 में आई फ़िल्म ‘वक्त’ यश चोपड़ा की पहली हिट फ़िल्म साबित हुई। इस फ़िल्म का गीत “ऐ मेरी जोहरा जबीं तुझे मालूम नहीं” दर्शकों को आज भी याद है। फ़िल्म 'इत्तेफाक' उनकी उन चुनिंदा फ़िल्मों में से है जिसमें उन्होंने कॉमेडी और रोमांस के अलावा थ्रिलर पर भी काम किया था।

यश राज बैनर की स्थापना
मुख्य लेख : यश राज फ़िल्म्स
1973 में उन्होंने फ़िल्म निर्माण में कदम रखा और यश राज बैनर की स्थापना की। इसकी शुरूआत राजेश खन्ना अभिनीत ‘दाग’ जैसी सुपरहिट फ़िल्म से की। इस फ़िल्म की कामयाबी ने उन्हें बॉलीवुड में नया नाम दिया। इसके बाद आई 1975 की फ़िल्म 'दीवार' जिसमें अमिताभ बच्चन ने अभिनय किया था। इस फ़िल्म की सफलता ने यश चोपड़ा को कामयाब निर्देशकों की श्रेणी में ला खड़ा किया। जहां उनकी फ़िल्मों में काम करने के लिए अभिनेता उनके घर के चक्कर लगाने लगे। इसके बाद तो यश चोपड़ा ने 'सिलसिला', ‘कभी-कभी’ जैसी फ़िल्मों में अमिताभ के साथ ही काम किया। हालांकि 80 के दशक की शुरूआत में यश चोपड़ा को असफलता का कड़वा स्वाद भी चखना पड़ा पर 1989 में आई 'चांदनी' ने उन्हें दुबारा एक सफल और हिट निर्देशक बना डाला। 1991 में आई 'लम्हे' भी इसी दौर की एक सुपरहिट फ़िल्म साबित हुई। इसके बाद उन्होंने 1995 में बतौर निर्माता फ़िल्म 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' में दांव लगाया। शाहरुख खान और काजोल के अभिनय से सजी यह फ़िल्म बॉलीवुड में नया इतिहास रच गई। इसके बाद 1997 में उन्होंने फ़िल्म ‘दिल तो पागल है’ का निर्देशन किया। कुछ सालों तक वह निर्देशन से दूर रहे और फिर लौटे 2004 की सुपरहिट फ़िल्म 'वीर जारा' को लेकर।

किंग ऑफ़ रोमांस
बॉलीवुड में रोमांस के अलग-अलग स्‍वरूप को परदे पर ढालने वाले यश चोपड़ा ने रोमांस को जितने रंगों में दिखाया उतना बॉलीवुड का कोई निर्देशक नहीं दिखा सका, इसीलिए यश चोपड़ा को बॉलीवुड का रोमांस किंग यानी ‘किंग ऑफ़ रोमांस’ कहा जाता है। यश चोपड़ा ने रोमांस को जुनूनी तौर पर, पागलपन के तौर पर, कुर्बानी के तौर पर, दु:ख-दर्द बांटने के तौर पर, कॉमेडी और थ्रिलर के साथ यानी हर तरह से प्‍यार को दिखाने की कोशिश की। यश चोपड़ा वहीं शख्‍सियत हैं जिन्‍होंने सिल्‍वर स्‍क्रीन पर प्‍यार और रोमांस की नई परिभाषा गढ़ी।
 फ़िल्मी सफ़र 📽️
धूल का फूल (1959)
वक़्त 1965)
दाग़ (1973)
दीवार (1975)
त्रिशूल (1978)
काला पत्थर (1979)
सिलसिला (1981)
चांदनी (1989)
डर (1993)
ये दिल्लगी (1994)
दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे (1995)
दिल तो पागल है (1997)
मोहब्बतें (2000)
मेरे यार की शादी है (2002)
हम तुम (2004)
धूम (2004)
वीर ज़ारा (2004)
बंटी और बबली (2005)
धूम 2 (2006)
चक दे इंडिया (2007)
रब ने बना दी जोड़ी (2008)
मेरे ब्रदर की दुल्हन (2011)
जब तक है जां (2012)
सम्मान और पुरस्कार
यश चोपड़ा को अब तक 11 बार फ़िल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। उन्हें 1964 में प्रदर्शित फ़िल्म 'वक्त' के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के लिए फ़िल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके बाद वह 1969 में फ़िल्म 'इत्तेफाक' सर्वश्रेष्ठ निर्देशक, 1973 में 'दाग' सर्वश्रेष्ठ निर्देशक, 1975 में 'दीवार' सर्वश्रेष्ठ निर्देशक, 1991 में 'लम्हे' सर्वश्रेष्ठ निर्माता, 1995 में 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' सर्वश्रेष्ठ निर्माता, 2001 में वह फ़िल्म जगह के सर्वोच्च सम्मान 'दादा साहब फालके पुरस्कार से भी सम्मानित किए गए। 2005 में उन्हें भारत सरकार द्वारा 'पद्म भूषण' से भी सम्मानित किया गया। फ़िल्म निर्माता यश चोपड़ा को भारतीय सिनेमा में उनके योगदान के लिए फ्रांस का सर्वोच्च ऑफिसियर डी ला लेजन पुरस्कार भी प्रदान किया गया। स्विस सरकार ने उन्हें “स्विस एंबेसडरर्स अवार्ड 2010” से सम्मानित किया है
रोमांस के बादशाह' यश चोपड़ा का निधन
'रोमांस के बादशाह' फ़िल्म निर्माता यश चोपड़ा का निधन 21 अक्टूबर 2012, रविवार को मुंबई के लीलावती अस्पताल में निधन हो गया

मालिका तरनूम(जनम)

नूरजहाँ  🎂जन्म 21 सितम्बर, 1926 ⚰️23 दिसम्बर, 2000  महान गायिका मल्लिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ  🎂जन्म 21 सितम्बर, 1926 ई. ⚰️23 दिसम्बर, 2000  न...