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Friday, May 31, 2024

सितंबर का महीना

01सितंबर30सितंबर तक



 

स्वागतम 01सितंबर से 30सितंबर
का इतिहास देखे।

 

कल्पना लाजमी

#31may 
#28sep 

कल्पना लाजमी
🎂31 मई 1954
⚰️23 सितंबर 2018, 
कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी हॉस्पिटल आणि मेडिकल रिसर्च इन्स्टिट्यूट, मुम्बई
माता-पिता: ललिता लाज़मी, गोपी लाज़मी
किताबें: Bhupen Hazarika: As I Knew Him
फ़िल्म मेकर कल्पना लाजमि 
समझने के लिए, वे हिंदी सिनेमा की सबसे ज़रूरी महिला डायरेक्टर्स में से एक थीं. वैसे कल्पना लाजमी को पसंद नहीं था कि उनको ‘महिला फिल्ममेकर’ कहा जाए. वे बस फिल्ममेकर थीं. जीवन में उन्होंने सिर्फ 6 फीचर फिल्में डायरेक्ट कीं. लोग ‘रुदाली’ और ‘दमन’ से आगे नहीं जा पाते मगर उनकी पहली ही फिल्म ऐसी औरत की कहानी थी जो शादी के बाहर एक पुरुष से संबंध बनाती है और उसे पाप नहीं मानती. कल्पना ने ख़ुद का जीवन भी ऐसे ही जिया. 17 की उमर में जब ज़ेवियर्स जैसे ग्लैमरस कॉलेज पढ़ रही थीं, तब वामपंथी विचारों वाले एक क्षेत्रीय गायक और कलाकार को देखकर सम्मोहित हो गईं. और अगले 40 बरस उनका रिश्ता चला. दोनों ने जीवनपर्यन्त विवाह नहीं किया. सहूलियत की जिंदगी जीने वाली इस लड़की को कई तकलीफें आईं, लेकिन उन्होंने जीवन का सारा ज़हर पिया. सदा किया वही जो उनको करना था. रविवार, 23 सितंबर 2018 के भोर अंधेरे वे चली गईं
जो उन्हें नहीं जानते उनके लिए कुछ बातें और कल्पना की याद.

पेंटर ललिता लाजमी की बेटी थीं. वही जो ‘तारे जमीं पर’ (2007) में बच्चों की पेंटिंग प्रतियोगिता की जज बनकर आती हैं.

कागज़ के फूल’ (1959) और ‘प्यासा’ (1957) जैसी महान फिल्में बनाने वाले गुरु दत्त उनके सगे मामा थे.

वे 31 मई 1954 को पैदा हुईं. बंबई में बड़ी हुई. घर में उनके अलावा उनका भाई देवदास था. सभ्रांत वर्ग से थीं. परिवार प्रगतिशील था. लेकिन कल्पना का कहना था कि उनका बचपन पीड़ा भरा रहा. उनके पिता शराब बहुत पीते थे और इससे वे बहुत परेशान होती थीं.

उनके जीवन में दो ही पुरुष थे जिनसे वो सबसे ज्यादा प्रभावित हुई. पहले थे उनके पिता गोपी लाजमी जो नेवी में कैप्टन थे. और दूसरे सिंगर, गीतकार और आर्टिस्ट भूपेन हजारिका.

शुरू से कल्पना बाग़ी और आक्रामक नहीं थीं. वे मासूम और अवाक आंखों वाली थीं. मिल्स एंड बून रोमैंस नॉवेल पढ़कर जवानी में कदम रखे. लेकिन बाद में उन्होंने अपनी फिल्मों में ठोस, ज़मीनी और मुश्किल महिला पात्र रचे.

कल्पना ने 1971 में बंबई के सेंट ज़ेवियर्स कॉलेज से साइकोलॉजी की पढ़ाई की. वहां उनकी मुलाकात भूपेन हज़ारिका से हुई जो कल्पना के ही अंकल आत्मा राम की फिल्म ‘आरोप’ के लिए म्यूजिक बना रहे थे. तब कल्पना सिर्फ 17 साल की थीं. वे भूपेन की रचनात्मकता, आवारगी, बाग़ीपन और बेतरतीब व्यक्तित्व से बहुत आकृष्ट हो गईं. पांच साल रिश्ते में रहने के बाद वे सबकुछ छोड़ कलकत्ता में भूपेन के फ्लैट में रहने लगीं. शुरू में उनके पिता को लगा कि ये आकर्षण जल्द ही खत्म हो जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हो पाया और उनका-भूपेन का रिश्ता 40 साल चला. उन दोनों ने कभी शादी नहीं की. लंबे समय तक असम के पारंपरिक समाज ने इस रिश्ते को स्वीकार नहीं किया. दोनों को दिक्कतें आईं. कल्पना की मां ललिता भी कभी उनके इस रिश्ते के पक्ष में नहीं थीं.

फिल्मों में उनकी शुरुआत श्याम बेनेगल को असिस्ट करने से हुई. उनकी फिल्म ‘भूमिका’ (1977) में वे कॉस्ट्यूम असिस्टेंट थीं. बाद में बेनेगल की फिल्म ‘मंडी’ (1983) में वो असिस्टेंट डायरेक्टर बन गईं. उन दिनों में देव बेनेगल (इंडियन ऑगस्ट, रोड़ मूवी) भी उनके साथ ही असिस्टेंट थे. देव याद करते हैं कि “वो ऊर्जा का भंडार थीं. वो अपने आस-पास के पुरुषों को असहज करती थीं क्योंकि अपने अधिकारों, अपने नजरिए और कहानी को अपने ढंग से कहने के लिए आक्रामक तरीके से खड़ी रहती थीं. वो दोस्तों की दोस्त थीं. सेंस ऑफ ह्यूमर था. खाने से प्यार था. फिल्मों का पैशन था.”

देव आनंद ने कल्पना को अपनी फिल्म ‘हीरा पन्ना’ (1973) में ज़ीनत अमान वाला रोल ऑफर किया था. पर उन्होंने मना कर दिया.

साल 1978 में कल्पना ने भूपेन ह़ज़ारिका के साथ मिलकर अपनी कंपनी शुरू की. उसी के अंतर्गत अपनी पहली डॉक्यूमेंट्री ‘डी. जी. मूवी पायोनियर’ (1978) डायरेक्ट की. ये फिल्म बंगाली फिल्ममेकर धीरेन गांगुली की लाइफ पर बेस्ड थी.

उन्होंने 1986 में अपनी पहली फीचर फिल्म ‘एक पल’ डायरेक्ट की. इसमें शबाना आज़मी, नसीरुद्दीन शाह, फारुख़ शेख़, दीना पाठक और श्रीराम लागू लीड रोल में थे. कल्पना और गुलज़ार ने इसकी स्क्रिप्ट लिखी थी. हज़ारिका ने म्यूजिक कंपोज किया था. ये अपने समय से काफी आगे की फिल्म थी. एक ऐसी औरत की कहानी थी जो शादीशुदा होने के बाद भी किसी दूसरे पुरुष के साथ संबंध बनाना स्वीकार करती है. और इसे लेकर उसे कोई पछतावा नहीं होता है. वो नतीजे भुगतने के लिए पूरी तरह तैयार होती है.

कल्पना ने 1988 में दूरदर्शन के लिए ‘लोहित किनारे’ नाम का सीरियल डायरेक्ट किया. इसमें तनवी आज़मी लीड रोल में थीं. इन्हीं तनवी ने ‘बाजीराव मस्तानी’ में पेशवा बाजीराव बने रणवीर सिंह की मां राधाबाई का रोल किया था.

वे और बॉलीवुड एक्ट्रेस दीपिका पादुकोण दूर के रिश्तेदार थे, लेकिन दीपिका को शायद ये पता नहीं था. कल्पना का कहना था – “दीपिका और मैं सारस्वत ब्राह्मण हैं. उनकी और मेरी फैमिली की जड़ें कश्मीर में हैं. हम कश्मीरी पंडित हैं जो वहां से बैंगलोर आकर बस गए थे. मेरे मामा गुरु दत्त बैंगलोर में रहते थे और दीपिका के पिता प्रकाश पादुकोण भी. दीपिका पक्का मेरी रिश्तेदार हैं, हालांकि उनको ये पता नहीं होगा.”

उनकी सबसे यादगार और अमर कर देने वाली फिल्म ‘रुदाली’ (1993) है जिसे बेस्ट एक्ट्रेस का नेशनल अवॉर्ड मिला था. इस साल फिल्म की रिलीज को 25 साल हो गए है. ये बंगाली लेखिका महाश्वेता देवी की लिखी लघु-कथा पर आधारित थी. फिल्म राजस्थान में बेस्ड ऐसी औरतों के बारे में थी जिनको किसी के मरने पर पैसा देकर रोने के लिए बुलाया जाता है. उन्हें रुदालियां (रुदन करने वाली) कहा जाता है. डिंपल कपाड़िया ने ऐसी ही ग्रामीण औरत शनीचरी का रोल किया था. शूटिंग के दौरान वे सख़्त हालात में रहीं. राजस्थान में शूटिंग के दौरान उनको निमोनिया हो गया था. उनके अलावा अभिनेत्री राखी फिल्म में बिनकी नाम की रुदाली बनी थीं. दुनिया जहान में इस फिल्म को सराहा गया, अवॉर्ड मिले. लेकिन राखी नाराज हो गई थीं. उनका कहना था कि डायरेक्टर कल्पना ने उनके सीन काट दिए और डिंपल कपाड़िया का रोल मजबूत कर दिया. जबकि ये दो हीरोइन वाली फिल्म थी और उनका रोल भी बराबरी का होना था. ख़ैर, इस फिल्म की विरासत ऐसी है कि लंबे समय तक बनी रहेगी. इसके गीत कभी भुलाए न जा सकेंगे.

उसके बाद कल्पना ने ‘दरमियान’ (1997) डायरेक्ट की. इसमें किरण खेर, आरिफ ज़कारिया, तबु और सयाजी शिंदे जैसे एक्टर्स थे. ये 1940 और 50 के हिंदी फिल्म उद्योग में सेट कहानी है. इसमें एक एक्ट्रेस है जिसका करियर उतार पर है. उसे एक बेटा पैदा होता है. जिसे हर्माफ्रोडाइट (hermaphrodite) नाम की मेडिकल कंडीशन है. वो पुरुष और स्त्री दोनों के सम्मिलित, अविकसित जननांगों के साथ पैदा होता है. इस स्थिति वालों को समाज मोटे तौर पर हिजड़ा कहने लगता है लेकिन दोनों अलग-अलग होते हैं. कहानी में आगे मां और बेटे का एक जटिल रिश्ता नजर आता है. ये भी कि तब का फिल्म उद्योग कैसा था और तब हिजड़ों की स्थिति कैसी थी. पहले इस रोल में शाहरुख खान को लिया गया था. लेकिन बाद में उन्होंने मना कर दिया. तब दूसरे एक्टर्स को ट्राई किया गया. अंत में आरिफ ज़कारिया ने ये रोल किया.

उसके बाद ‘दमन’ (2001) आई. शादी के बाद पति द्वारा पत्नी का रेप यानी मैरिटल रेप इसका विषय था. ये एक तरह की घरेलू हिंसा और रेप है जिससे न जाने कितनी पत्नियां उत्पीड़ित होती हैं. लेकिन ज्यादातर इसे लेकर जागरूक नहीं होतीं और होती हैं तो चुप रहती हैं. भारत सरकार के परिवार कल्याण विभाग ने इस सामाजिक विषय पर कुछ करने के लिए कल्पना लाजमी से संपर्क किया था. उन्होंने ‘दमन’ की कहानी लिखी. कहानी परिवार कल्याण विभाग को पसंद आई और उन्होंने इसमें पैसा लगाया. रवीना टंडन ने इसमें दुर्गा नाम की युवती का रोल किया जिसका हिंसक पति (सयाजी शिंदे) उसके साथ मैरिटल रेप करता है. कल्पना की इस फिल्म से रवीना को बेस्ट एक्ट्रेस का नेशनल अवॉर्ड मिला था.

उन्होंने ‘सिंहासन’ नाम से एक स्क्रिप्ट लिखी हुई थी. ये एक पोलिटिकल ड्रामा होनी थी. कल्पना इसमें ऐश्वर्या राय को लीड रोल में लेना चाहती थीं. अगर ऐसा हो पाता तो ऐश्वर्या के करियर की पहली फिल्म होती जिसमें वे किसी राजनेता का रोल करतीं.

बतौर डायरेक्टर उनकी अंतिम दो फिल्में ‘क्यों’ (2003) और ‘चिंगारी’ (2006) थीं. ‘चिंगारी’ में सुष्मिता सेन ने एक गांव की वेश्या बसंती का रोल किया था जिसके साथ गांव का मुख्य पुजारी (मिथुन चक्रवर्ती) रेप करता है. गांव में नया आया डाकिया चंदन (अनुज साहनी) बसंती से प्यार करने लगता है. उनकी शादी होने वाली होती है लेकिन पुजारी उसकी हत्या कर देता है. अंत में बसंती उसका संहार करती है. कल्पना की इन दो फिल्मों को छोड़ दें तो बाकी सब प्रशंसनीय थीं.

काफी वर्षों से वे किडनी के कैंसर का इलाज करवा रही थीं. इस कठिन समय में उनकी पक्की दोस्त सोनी राजदान उनके साथ खड़ी थीं. जो लाखों रुपये का खर्चा आता रहा, उसमें मदद करती रहीं. उनके अलावा आलिया भट्ट, रोहित शेट्टी, आमिर खान, सलमान खान, जावेद अख़्तर, शबाना आज़मी, नीना गुप्ता और उनके पुराने दोस्तों ने भी वित्तीय मदद की. उनकी दोनों किडनी निकाली जा चुकी थी और वे डायलसिस पर थीं इसके बावजूद उनको यकीन था कि वे ठीक हो जाएंगी. कल्पना ने याद किया था कि इस वक्त में उनकी मां ललिता लाजमी उनके लिए सबसे बड़ा सपोर्ट रहीं.

उन्होंने कहा था कि वे फिर से फिल्में बनाने के लिए बेचैन हो रही हैं. जैसे ही पैरों पर खड़ी होंगी, लौटेंगी. उन्होंने अपने जीवनसाथी भूपेन हजारिका पर बुक भी लिखी – Bhupen Hazarika – The Way I Knew Him. वे भूपेन के जीवन पर ‘द टेम्पेस्ट’ नाम से फिल्म बनाने की प्लानिंग भी कर चुकी थी, कास्टिंग भी चल रही थी. उनसे पहले पूजा भट्ट ये फिल्म बनाना चाहती थीं.

अपने जीवन को लेकर उनका कहना था कि तमाम कष्टों के बीच उन्होंने जो भी जीवन जिया उसे उसकी संपूर्णता में जिया और हरेक दिन को आनंद लेकर जिया. बीमारी ने जब उनको पूरी तरह तोड़ दिया था तो भी उनका कहना था – “मेरी किडनीज़ फेल हुई हैं, मैं नहीं.”

कल्पना लाजमी
एक भारतीय फिल्म निर्देशक , निर्माता और पटकथा लेखक थीं । लाजमी एक स्वतंत्र फिल्म निर्माता थीं जो यथार्थवादी, कम बजट की फिल्मों पर अधिक काम करती थीं, जिन्हें भारत में समानांतर सिनेमा के रूप में जाना जाता है । उनकी फिल्में अक्सर महिला-उन्मुख होती थीं। वह लंबे समय तक भूपेन हजारिका के साथ प्रबंधक रहीं। उन्हें 2017 में किडनी कैंसर का पता चला और 23 सितंबर 2018 को 64 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।
कल्पना लाजमी चित्रकार ललिता लाजमी और नौसेना कप्तान गोपी लाजमी की बेटी थीं ।  वह फिल्म निर्माता गुरु दत्त की भतीजी थीं , उन्होंने अनुभवी फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल के अधीन सहायक निर्देशक के रूप में शुरुआत की , जो पादुकोण परिवार के उनके रिश्तेदार भी थे। बाद में उन्होंने श्याम बेनेगल की भूमिका: द रोल में सहायक पोशाक डिजाइनर के रूप में काम किया। उन्होंने 1978 में डॉक्यूमेंट्री फिल्म डीजी मूवी पायनियर के साथ निर्देशन की शुरुआत की और ए वर्क स्टडी इन टी प्लकिंग (1979) और अलोंग द ब्रह्मपुत्र (1981) जैसी और डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्देशन किया । उन्होंने 1986 में एक पल (ए मोमेंट) के साथ फीचर फिल्म निर्देशक के रूप में शुरुआत की ,

इसके बाद उन्होंने फ़िल्मों के निर्देशन से ब्रेक लिया और तन्वी आज़मी अभिनीत अपना पहला टेलीविज़न धारावाहिक लोहित किनारे (1988) निर्देशित किया । उन्होंने 1993 में डिंपल कपाड़िया अभिनीत समीक्षकों द्वारा प्रशंसित रुदाली के साथ सिनेमा में वापसी की। कपाड़िया ने अपने प्रदर्शन के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार जीता और लाजमी ने भी फ़िल्म के निर्देशन के लिए प्रशंसा प्राप्त की।

उनकी अगली फ़िल्म दरमियान: इन बिटवीन (1997) थी जिसका निर्देशन और निर्माण उन्होंने खुद किया था। इस फ़िल्म में किरण खेर और तब्बू ने अहम और प्रभावशाली भूमिकाएँ निभाई थीं।

2001 में उनकी अगली फ़िल्म दमन: ए विक्टिम ऑफ़ मैरिटल वायलेंस थी । इस फ़िल्म को भारत सरकार ने वितरित किया था और आलोचकों ने इसे काफ़ी सराहा था। यह दूसरी बार था जब लाजमी के निर्देशन में किसी अभिनेत्री ने सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार जीता। इस बार यह पुरस्कार रवीना टंडन को मिला , जिन्हें पहले उतना सराहा नहीं गया था, और लाजमी को उनके अंदर छिपी प्रतिभा को तलाशने का श्रेय दिया गया।

उनकी अगली फिल्म, क्यों? (2003) को कोई खास पहचान नहीं मिली, जबकि उनकी आखिरी रिलीज और आखिरी फिल्म 2006 में आई चिंगारी थी जिसमें सुष्मिता सेन ने एक गांव की वेश्या की भूमिका निभाई थी। चिंगारी बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप साबित हुई।

🎥1978 डीजी मूवी पायनियर निदेशक
1979 चाय तोड़ने पर एक कार्य अध्ययन निदेशक
1981 ब्रह्मपुत्र के किनारे निदेशक
1986 एक पल निर्देशक, निर्माता, लेखक
1988 लोहित किनारे निदेशक
1993 रुदाली निर्देशक, लेखक
1997 दरमियान: इन बिटवीन निर्देशक, निर्माता
2001 दमन: वैवाहिक हिंसा का शिकार निर्देशक, लेखक
2003 क्यों? निर्देशक, निर्माता
2006 चिंगारी निर्देशक, निर्माता, लेखक

Tuesday, May 28, 2024

महबूब खान

#09sep
#28may
अभिनेता महबूब खान
🎂09 सितंबर 1907, बिलिमोरा
⚰️ 28 मई 1964, मुम्बई
पत्नी: सरदार अख्तर (विवा. 1942–1964)
बच्चे: साजिद खान, इकबाल खान
इनाम: फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार - सर्वश्रेष्ठ निर्देशक,
फ़िल्म निर्माता निर्देशक
भारतीय फिल्म जगत के इतिहास में अनेक बड़े नाम हुए हैं, इनमे से एक नाम महबूब ख़ान भी है जो कभी भी भुलाया नहीं जा सकता, महबूब खान ने समाज के समस्याओं से जुड़े विषयों को अपनी फिल्मों के ज़रिय लोगों तक पहुँचाया, वो समाजवादी सिनेमा का दौर था, उस समय अंग्रेज़ों से मुकाबला और भारतीय समाज के अंदर के विद्रोह को बहुत शानदार तरीके से पेश करने वाले महबूब खान ने मदर इंडिया फिल्म के ज़रिये इतिहास रच दिया था, यह फिल्म देश विदेशों में बहुत मशहूर हुई थी
हिंदी सिनेमा के 100 से भी अधिक वर्ष का इतिहास मूल रूप से प्रेम के चित्रण का इतिहास रहा है | फिल्मो में तो नायक-नायिका का प्यार हमेशा दिखाया जाता है लेकिन कुछ ऐसे फ़िल्मकार भी रहे है जो पर्दे पर नायिका का प्यार दिखाते दिखाते अंत में पर्दे के पीछे ही नायिका के प्यार में पागल हो बैठे | उन्ही में से एक थे बहुचर्चित महान फिल्मकार महबूब खान
महबूब खान  का जन्म गुजरात के सुरत शहर के निकट के छोटे से गाँव में 7 सितम्बर 1906 को एक गरीब परिवार में हुआ था | शुरू से ही वो एक मेहनतकश इन्सान थे इसलिए उन्होंने अपने निर्माण संस्थान महबूब प्रोडक्शन का चिन्ह हंसिया हथौड़े को दर्शाता हुआ रखा  जब वह 1925 के आसपास बम्बई नगरी में आये तो इम्पीरियल कम्पनी वाल ने उन्हें अपने यहा हेल्पर के रूप में रखा लिया | कई वर्ष बाद उन्हें फिल्म “बुलबुले बगदाद” में खलनायक का किरदार निभाना पड़ा
महबूब खान  शूरवात में बहुत शराब पीते थे और उनके नाम के साथ कई प्रेम कहानिया भी जुडी वह जिस अभिनेत्री को भी अपनी फिल्म में मौका देते उससे प्यार कर बैठते | उनके निर्देशन में पहली फिल्म “अल हिलाल” 1935 में बनी जो सागर मुवीटोन वालो की फिल्म थी | उसमे अभिनेत्री अख्तरी मुरादाबादी के साथ काम करते करते वह उनके प्यार में उलझ गये | आजादी से पूर्व फिल्म “औरत”का निर्देशन किया जिसकी नायिका सरदार अख्तर पर भी महबूब आशिक हो गये और उनका प्यार 24 मई 1942 को शादी में बदल गया | उनकी कोई सन्तान नही हुयी |
फिल्म “बहन” में एक नायिका हुस्न बानो ने काम किया | उसका असली नाम था रोशन आरा | महबूब खान  उसके प्यार में भी उलझ गये | निम्मी की माँ वहीदन महबूबबाई भी महबूब से बहुत प्यार करती थी | महबूब खान जब तीसरी दशक में मुम्बई आये तो उन्होंने सबसे पहले सागर मुवीटोन वालो की लगभग एक दर्जन फिल्मो में सिर्फ अभिनय किया | इसके पश्चात सागर वालो ने सर्वप्रथम फिल्म “अह्लिवाल” में महबूब को निर्देशन का मौका दिया | इसके पश्चात तो महबूब के निर्देशन में सागर कम्पनी वालो की “मनमोहन” “एक ही रास्ता” तथा “अलीबाबा” जैसी फिल्मे आयी |

1940 में महबूब खान  सागर कम्पनी छोडकर नेशनल स्टूडियो में आ गये | यहा आकर उन्होंने सर्वप्रथम फिल्म “औरत” का निर्देशन किया | अनिल विस्वास के संगीत से सजी फिल्म में नायिका सरदार अख्तर के साथ सुरेन्द्र तथा अरुण आदि कलाकारों ने काम किया | इसके पश्चात उनके निर्देशन में नेशनल फिल्म वालो की फिल्म “बहन” और “रोटी” आयी 1942 में उन्होंने अपनी निर्माण संस्था महबूब प्रोडक्शन की स्थापना की और निर्माता-निर्देशक के रूप में अभिनेता अशोक कुमार को लेकर पहली फिल्म “नजमा” का निर्माण किया | इसके पश्चात तो महबूब प्रोडक्शन के अंतर्गत उन्होंने “तकदीर” “अनमोल घड़ी” “एलान” “अनोखी अदा” “अंदाज” “आन” “मदर इंडिया” “सन ऑफ़ इंडिया” जैसी फिल्मो का निर्माण किया
महबूब खान की फिल्मो की सफलता का मुख्य कारण था प्रख्यात संगीतकार नौशाद का संगीत | उनके संगीत ने उन्हें पहली पंक्ति के फिल्मकारों में ला खड़ा किया | महबूब निर्माता-निर्देशक होने के साथ ही बेहतरीन लेखक भे थे | उनकी फिल्मे बड़े कलाकारों से पहले खुद के उनके नाम से जानी जाती थी | वह ऐसे फिल्मकार रहे जो भारत-पाक विभाजन पर भी पाकिस्तान नही गये | भारत में रहकर ही उन्होंने दर्जनों फिल्मो का निर्माण किया | उन्होंने फिल्म “औरत” को दोबारा “मदर इंडिया” के नाम से बनाया जो भारत की सरताज फिल्म कहलाई | इस फिल्म का गीत-संगीत नौशाद ने बहुत ही मधुर धुनों में पिरोया |
महबूब खान की फिल्म “अनमोल घड़ी” में नूरजहाँ, सुरैया, सुरेन्द्र “अनोखी अदा ” में नसीम बानो, सुरेन्द्र “अंदाज” में दिलीप कुमार, मधुबाला, निम्मी जैसे बड़े लोकप्रिय कलाकारों ने अपने अभिनय का जौहर दिखाए | उनकी सबसे चर्चित फिल्म “मदर इंडिया” में एक बार फिर महबूब ने राजकुमार, राजेन्द्र कुमार, सुनील दत्त, नरगिस आदि कलाकारों को लिया जो फिल्म इतिहास के सबसे चर्चित कलाकार कहलाये | उनकी आखिरी फिल्म “सन ऑफ़ इंडिया” बुरी तरह असफल रही | भले ही इस फिल्म का गीत-संगीत काफी चर्चित रहा हो लेकिन महबूब खान को यह फिल्म घाटा दे गयी

1940 में महबूब खान  सागर कम्पनी छोडकर नेशनल स्टूडियो में आ गये | यहा आकर उन्होंने सर्वप्रथम फिल्म “औरत” का निर्देशन किया | अनिल विस्वास के संगीत से सजी फिल्म में नायिका सरदार अख्तर के साथ सुरेन्द्र तथा अरुण आदि कलाकारों ने काम किया | इसके पश्चात उनके निर्देशन में नेशनल फिल्म वालो की फिल्म “बहन” और “रोटी” आयी 1942 में उन्होंने अपनी निर्माण संस्था महबूब प्रोडक्शन की स्थापना की और निर्माता-निर्देशक के रूप में अभिनेता अशोक कुमार को लेकर पहली फिल्म “नजमा” का निर्माण किया | इसके पश्चात तो महबूब प्रोडक्शन के अंतर्गत उन्होंने “तकदीर” “अनमोल घड़ी” “एलान” “अनोखी अदा” “अंदाज” “आन” “मदर इंडिया” “सन ऑफ़ इंडिया” जैसी फिल्मो का निर्माण किया
महबूब खान की फिल्मो की सफलता का मुख्य कारण था प्रख्यात संगीतकार नौशाद का संगीत | उनके संगीत ने उन्हें पहली पंक्ति के फिल्मकारों में ला खड़ा किया | महबूब निर्माता-निर्देशक होने के साथ ही बेहतरीन लेखक भे थे | उनकी फिल्मे बड़े कलाकारों से पहले खुद के उनके नाम से जानी जाती थी | वह ऐसे फिल्मकार रहे जो भारत-पाक विभाजन पर भी पाकिस्तान नही गये | भारत में रहकर ही उन्होंने दर्जनों फिल्मो का निर्माण किया | उन्होंने फिल्म “औरत” को दोबारा “मदर इंडिया” के नाम से बनाया जो भारत की सरताज फिल्म कहलाई | इस फिल्म का गीत-संगीत नौशाद ने बहुत ही मधुर धुनों में पिरोया |
महबूब खान की फिल्म “अनमोल घड़ी” में नूरजहाँ, सुरैया, सुरेन्द्र “अनोखी अदा ” में नसीम बानो, सुरेन्द्र “अंदाज” में दिलीप कुमार, मधुबाला, निम्मी जैसे बड़े लोकप्रिय कलाकारों ने अपने अभिनय का जौहर दिखाए | उनकी सबसे चर्चित फिल्म “मदर इंडिया” में एक बार फिर महबूब ने राजकुमार, राजेन्द्र कुमार, सुनील दत्त, नरगिस आदि कलाकारों को लिया जो फिल्म इतिहास के सबसे चर्चित कलाकार कहलाये | उनकी आखिरी फिल्म “सन ऑफ़ इंडिया” बुरी तरह असफल रही | भले ही इस फिल्म का गीत-संगीत काफी चर्चित रहा हो लेकिन महबूब खान को यह फिल्म घाटा दे गयी

🎥

एक निर्देशक के रूप में

सन ऑफ इंडिया (1962)
मुट्ठी भर अनाज (1959)
मदर इंडिया (1957)
अमर (1954)
आन (1952)
अंदाज़ (1949)
अनोखी अदा (1948)
एलान (1947)
अनमोल घड़ी (1946)
हुमायूं (1945)
नजमा (1943)
तक़दीर (1943)
रोटी (1942)
हुमा गुन अनमोगाल्डी (1942) [14]
बहन (1941)
अलीबाबा (1940)
औरत (1940)
एक ही रास्ता (1939)
हम तुम और वो (1938)
वतन (1938)
जागीरदार (1937)
डेक्कन क्वीन (1936)
मनमोहन (1936)
अल हिलाल उर्फ ​​जजमेंट ऑफ़ अल्लाह (1935)

🎥एक निर्माता के रूप में

मदर इंडिया (1957)
अमर (1954)
आन (1952)
अनोखी अदा (1948)
एलान (1947)
अनमोल घड़ी (1946)
ज़रीना (1932)

🎥एक अभिनेता के रूप में
चंद्रहास (1933)
ज़रीना (1932)
दिलावर (1931)
मेरी जान (1931)

✍️एक लेखक के रूप में

वतन (1938) (कहानी)
अल हिलाल उर्फ ​​जजमेंट ऑफ अल्लाह (1935) (कहानी, पटकथा)

Sunday, May 26, 2024

फिरोज खान

#25sep 
#27may 
फ़िरोज़ खान
के रूप में जन्मे जुल्फिकार अली शाह खान भारतीय फिल्म अभिनेता
🎂जन्म  25 सितंबर 1939
जन्म (शहर) बैंगलोर, मैसूर

⚰️मृत्यु 27 मई,2009


उनके पिता पठान थे जबकि माता ईरानी .उनके तीन और भाई भी फ़िल्मों से जुड़े . एक हैं संजय ख़ानदूसरे हैं अकबर खान और तीसरे हैं समीन खान अकबर ने जहाँ अभिनय में हाथ आजमाए वहीं समीर ने फ़िल्म निर्माण का क्षेत्र चुना.फिरोज खान की भतीजी और संजय खान की बेटी सुजान की शादी ऋतिक रौशन से हुई है, जो फ़िल्मकार राकेश रौशन के पुत्र हैं। फिरोज खान ने पत्नी सुंदरी के साथ जिन्दगी का सफर 1965 में शुरू किया। दोनो 20 साल तक साथ रहे। . 1985 में उनके बीच तलाक हो गया।

फिरोज खान ने वर्ष 1960 में फ़िल्म दीदी से अपनी फ़िल्मी सफर शुरू किया। दर्जनों फ़िल्मों में अभिनय किया। कई फ़िल्में निर्देशित की.और भी कई भूमिकाओं से जुड़े रहे। .लगभग पांच दशक का फ़िल्मी सफर तय करते हुए फिरोज खान ने 2007 में आखिरी फ़िल्म दी-वेलकम, जिसमें वे खास अंदाज में पेश आए.उनका आरडीएक्स उपनाम खासा चर्चित रहा.आदमी और इंसान फ़िल्म के लिए उन्हें फ़िल्म फेयर अवार्ड मिला.उसके अलावे खान ने ऊंचे लोग, मैं वहीं हूं, अपराध, उपासना, मेला, आग जैसी फ़िल्मों से पहचान मिली. फ़िल्म धर्मात्मा, जानबाज, कुर्बानी, दयावान जैसी फ़िल्मों ने उन्हें शोहरत दिलाई. काफी दिनों तक कैंसर से जुझ रहे फिरोज खान ने बंगलौर के अपने फार्म हाउस में 27 मई,2009 की रात आखिरी सांस ली.
📽️
(हिन्दी फ़िल्में) 
बतौर निर्देशक
2003 जानशीन 
1998 प्रेम अगन 
1992 य़लगार 
1988 दयावान 
1986 जाँबाज़ 
1980 कुर्बानी 
1975 धर्मात्मा 
1972 अपराध
📽️
2007 वैलकम सिकन्दर 
2003 जानशीन 
1992 य़लगार 
1988 दो वक्त की रोटी 
1988 दयावान 
1986 जाँबाज़ इंस्पेक्टर 
1982 कच्चे हीरे 
1981 खून और पानी 
1980 कुर्बानी 
1977 जादू टोना 
1977 दरिन्दा 
1976 नागिन राज 
1976 शराफत छोड़ दी मैंने 
1975 काला सोना 
1975 धर्मात्मा 
1975 रानी और लालपरी 
1974 अंजान राहें
1974 इंटरनेशनल क्लॉक
1974 गीता मेरा नाम 
1974 खोटे सिक्के 
1972 अपराध 
1971 एक पहेली
1970 सफर 
1969 प्यासी शाम 
1967 रात और दिन 
1966 तस्वीर 
1965 ऊँचे लोग 
1964 सुहागन 
1962 मैं शादी करने चला

Tuesday, May 21, 2024

विट्ठल भाई पटेल

#21may
#07sep
झूठ बोले कौव्वा काटे ,ना मांगू सोना चांदी जैसे गानो को लिखने वाले प्रसिद्ध फ़िल्म गीतकार, कवि एवं राजनेता
विट्ठलभाई पटेल

🎂21 मई 1936 
⚰️07 सितंबर 2013

एक भारतीय कवि, गीतकार और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता थे, जिन्हें सामाजिक सेवाओं और राजनीति में उनके योगदान के साथ-साथ "ना मांगू सोना चांदी" और "  झूठ बोले कौवा काटे" जैसे गानो के लिए जाना जाता है बॉबी फ़िल्म 1973 में रिलीज हुई थी
वह सागर, मध्य प्रदेश, के रहने वाले थे जहाँ उन्होंने अपना अधिकांश जीवन व्यतीत किया।  उन्होंने हिंदी और बुंदेली में लिखा।

लंबी बीमारी के बाद 7 सितंबर 2013 को उनका निधन हो गया वह 75 वर्ष के थे।
पटेल दो बार मध्य प्रदेश विधानसभा के लिए सागर, मध्य प्रदेश निर्वाचन क्षेत्र से चुने गए थे।  वह अर्जुन सिंह, मोतीलाल वोरा और श्यामा चरण शुक्ल के मंत्रिमंडल में मंत्री थे।
पटेल ने 55 हिंदी फिल्मी गीतों के बोल लिखे, साथ ही पांच कविता संग्रह भी लिखे।

विट्ठल भाई पटेल 
वे एक बेहतरीन गीतकार थे, बल्कि अच्छे इंसान, ईमानदार और सुचिता वाले राजनेता भी थे। फिल्मी जगत से जुड़ाव के बावजूद सादगी उनके रग-रग में थी। उनके दोस्त, जानने वाले हमेशा उनके इस गुण के कायल रहे हैं।
हमारी खास प्रस्तुति में हमने विटठ्लभाई व उनके जीवन के महत्वपूर्ण पड़ावों को चित्रों के जरिए संजोने की कोशिश की है। विट्ठलभाई कैसे थे? उनके जीवन का गीतकार, कलाकार, राजनेता, विचारक, समाजसेवी, साहित्यकार फलसफा क्या था? इसके जवाब भी विट्ठलभाई के शब्दों में ही हैं...

21 मई 1936 को जन्मे। सागर विश्वविद्यालय से बी-कॉम। 1960-70 के दशक में बॉबी, सत्यम-शिवम-सुंदरम, सन्यासी, विश्वनाथ सहित कई फिल्मों में 40 से अधिक गीत लिखे। हिंदी सिनेमा के 'शो-मेन' राजकपूर के दोस्त एवं पसंदीदा गीतकार।
1969 में पहली कार रैली के विजेता। मध्यप्रदेश सरकार में 1982 से 1989 तक मंत्री रहे। मुंबई-दिल्ली-सागर तक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय। 550 दिन सफाई अभियान एवं स्व. किशोर कुमार की समाधि बनाने के लिए 1 रुपए दान अभियान से चर्चित हुए। प्यासे घट, दीवारों के खिलाफ, दूर तक छाया नहीं, अंत नहीं आरंभ आदि... सहित कई पुस्तकें लिखीं।
अपनी धरती-अपने लाल: राजकपूर ने कहा और गीतकार विट्ठल भाई ने लिख दिया, झूठ बोले कौवा काटे काले कौवे से डरियो..
लंबे समय तक पृथक बुंदेलखंड राज्य आंदोलन के दौरान विट्ठल भाई पटेल के साथ रहे झांसी निवासी हरिमोहन विश्वकर्मा बताते हैं कि सत्तर के दशक में विट्ठल भाई की मुंबई की मायानगरी के क्षितिज पर धूम थी।

विट्ठलभाई पटेल के आग्रह पर राजकपूर ने अपनी फिल्म 'तीसरी कसम' की शूटिंग सागर जिले के खिमलासा में की। वे खुद भी कुछ दिनों तक यहां विट्ठलभाई के साथ रहे। फिल्म जगत से जुड़ी कई बड़ी हस्तियों का उन्हें साथ मिला।
राजनीति में गांधी परिवार और फिल्म जगत में कपूर परिवार से उनके बेहद नजदीकी रिश्ते रहे। श्री पटेल के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का ही यह कमाल था कि सागर नगर में देश के कई नामी कलाकार, साहित्यकार अनवरत रूप से यहां आते रहे।

Friday, May 17, 2024

श्याम राम से

#17may 
#18sep 
श्याम रामसे
🎂17 मई 1952, मुम्बई
⚰️ 18 सितंबर 2019, मुम्बई
भाई: तुलसी रामसे, गंगु रामसे, केशु रामसे, कुमार रामसे, किरण रामसे
बच्चे: साशा रामसे
माता-पिता: एफ० यू० रामसे
  श्याम रामसे एक बॉलीवुड फिल्म निर्देशक थे।  वह उन सात रामसे ब्रदर्स में से एक थे जो 1970 और 1980 के दशक में भारतीय सिनेमा में सक्रिय थे । श्याम रामसे को इस समूह का मुख्य कलाकार और प्रमुख माना जाता था। उन्होंने दरवाज़ा (1978), पुराना मंदिर (1984), और वीराना (1988) जैसी कई डरावनी फिल्में बनाईं ।

1980 के दशक के अंत में उनकी लोकप्रियता कम हो गई, क्योंकि रामसे ने अपनी रचनात्मक ऊर्जा को मोड़ना शुरू कर दिया और टेलीविजन प्रोग्रामिंग पर ध्यान केंद्रित करना शुरू कर दिया, जो कि भारत में नब्बे के दशक की शुरुआत में लॉन्च किए गए ज़ी टीवी , स्टार प्लस आदि जैसे कई निजी चैनलों के कारण मांग में था। . उन्होंने ज़ी टीवी के लिए भारत की पहली हॉरर टीवी श्रृंखला - ज़ी हॉरर शो शुरू की । यह बहुत बड़ी हिट थी और इसकी लोकप्रियता इसके प्रशंसकों द्वारा फेसबुक और ऑर्कुट जैसे सोशल नेटवर्किंग समुदायों पर इसकी याद में बनाए गए विभिन्न समुदायों से साबित होती है।

ज़ी हॉरर शो के बाद , उन्होंने ज़ी टीवी के लिए सैटरडे सस्पेंस , एक्स ज़ोन और नागिन के कुछ एपिसोड बनाए । 2008 में, उन्होंने अपनी बेटी साशा रामसे के साथ, सहारा वन के लिए इच्छाधारी मादा नागिन की अवधारणा पर आधारित एक अलौकिक श्रृंखला का निर्देशन किया, जिसका नाम नीली आंखें था ।

श्याम रामसे वर्ष 2000 से फीचर फिल्मों में वापस आए जब उन्होंने धुंध: द फॉग का निर्माण शुरू किया जो 21 फरवरी 2003 को रिलीज हुई थी। फिर उन्होंने 2007 में घुटन और 2010 में एक कॉमेडी हॉरर फिल्म, बचाओ बनाई । उनकी नवीनतम रिलीज नेबर्स रिलीज हुई। जनवरी 2014 में.

🎥फ़िल्मों का निर्देशन किया

जेंटायांगन (2018)
कोई है (2017)
पड़ोसी (2014)
बचाओ - इनसाइड भूत है... (2010)
घुटन (2007)
धुंड: द फॉग (2003)
तलाशी (2000)
नागिन (1999) (टीवी श्रृंखला)
अनहोनी (1998) (टीवी श्रृंखला)
ज़ी हॉरर शो (1993-97) (टीवी श्रृंखला)
महाकाल (1993)
पुलिस माथु दादा (1991)
इंस्पेक्टर धनुष (1991)
अजूबा कुदरत का (1991)
बंद दरवाजा (1990)
पुरानी हवेली (1989)
वीराना (1988) 
तहखाना (1986)
टेलीफोन (1985)
सामरी (1985)
पुराना मंदिर (1984)
घुंघरू की आवाज़ (1981)
होटल (1981)
सन्नाटा (1981)
दहशत (1981)
सबूट (1980)
गेस्ट हाउस (1980 फ़िल्म) (1980)
और कौन? (1979)
दरवाज़ा (1978)
अँधेरा (1975)
दो गज ज़मीन के नीचे (1972)
नकुली शान (1971)

फ़िल्में संपादित कीं

वीराना (1988)
खेल मोहब्बत का (1986) (श्याम के रूप में)
टेलीफोन (1985)
पुराना मंदिर (1984)
घुंघरू की आवाज़ (1981)
दहशत (1981) (सह-संपादक)
सबूट (दुनिया में 19 गहराई एक महान80 है) (सह-संपादक)
गेस्ट हाउस (1980) 

फ़िल्में लिखीं

इंस्पेक्टर धनुष (1991) (कहानी) (तुलसी-श्याम के रूप में)
बंद दरवाज़ा (1990) (पटकथा)
वीराना (1988) (पटकथा)
बुद्ध मिल गया (1971) (कहानी) (श्याम के रूप में)

फ़िल्मों का निर्माण किया

घुटन (2007) (निर्माता)
बंद दरवाजा (1990)
वीराना (1988)
सामरी 3डी (1986) (निर्माता)

Monday, May 13, 2024

असित सेन

#13may 
#18sep 
असित सेन
13 मई 1917
गोरखपुर , आगरा और अवध का संयुक्त प्रांत , ब्रिटिश भारत
मृत
18 सितम्बर 1993 (आयु 76 वर्ष)
कलकत्ता , पश्चिम बंगाल , भारत
राष्ट्रीयता
भारतीय
अन्य नामों
असित कुमार सेन
व्यवसाय
अभिनेता , फ़िल्म निर्देशक
सक्रिय वर्ष
1949-1993
उल्लेखनीय कार्य
बीस साल बाद

एक भारतीय फिल्म निर्देशक थे जो हिंदी फिल्म उद्योग में प्रसिद्ध हास्य अभिनेता बने । उन्होंने 1953 से 1993 के बीच अपनी मृत्यु तक 2 फिल्मों का निर्देशन किया और 200 से अधिक फिल्मों में अभिनय किया। एक अभिनेता/हास्य अभिनेता के रूप में, उन्होंने अक्सर एक पुलिस निरीक्षक या जमींदार जैसे अधिकारपूर्ण चरित्र को चित्रित किया, लेकिन हास्य प्रभाव के साथ, ज्यादातर धीमे बोलने वाले व्यक्ति के रूप में। उनका अभिनय करियर विशेष रूप से 1960, 1970 और 1980 के दशक की शुरुआत में शानदार रहा। उनके विशाल शारीरिक ढांचे के विपरीत उनकी आवाज बहुत पतली थी और वे अपने संवाद धीमी गति से बोलते थे।
सेन ने अपने करियर की शुरुआत कोलकाता में निर्देशक-निर्माता बिमल रॉय की सहायता से की, हालाँकि, कोलकाता स्थित फिल्म उद्योग अब गिरावट पर था, इस प्रकार रॉय 1950 में रॉय की टीम के साथ बॉम्बे (अब मुंबई) में स्थानांतरित हो गए, जिसमें सेन, हृषिकेश शामिल थे। मुखर्जी, नबेंदु घोष, कमल बोस और बाद में सलिल चौधरी। फिल्मों में छोटी भूमिकाएँ करने के साथ-साथ उन्होंने अपने गुरु के प्रोडक्शन हाउस, परिवार (1956) और अपराधि कौन (1957) के लिए दो फिल्मों का निर्देशन किया, अभिनय को अपने पूर्णकालिक करियर के रूप में चुनने से पहले, उन्होंने उद्योग में लगभग हर ज्ञात नाम के साथ हास्य भूमिकाएँ निभाईं।
🎥
1949 छोटा भाई 
1950 पहला आदमी
1955 अमानत 
1956 परिवार
1957 अप्राधि कौन 
1958 चलती का नाम गाड़ी
1959 सुजाता
1960 पारख
1961 
काबुलीवाला 
छाया 
जंगली
1962 
बीस साल बाद 
बात एक रात की
1963 बंदिनी 
1964 
बेनजीर 
चाँदी की दीवार
1965 
मेरे सनम 
चांद और सूरज 
भूत बंगला
1967 
नौनिहाल 
नई रोशनी 
जाल 
चंदन का पालना 
उपकार
1968 
ब्रह्मचारी 
दूनी चार करो
1969 
रस्ते करो 
यक़ीन 
आराधना 
प्यार का मौसम 
तमन्ना 
बेटी
1970 
पूरब और पश्चिम 
पगला कहीं का 
अभिनेत्री
1971 
उपासना 
मझली दीदी 
बुड्ढा मिल गया 
मेरा गांव मेरा देश 
आनंद  
दूर का राही 
बिखरे मोती 
चाहत 
मेरे अपने
1972 
अमर प्रेम
बॉम्बे टू गोवा 
अन्नदाता
अनुराग
बंधे हाथ
चोर करो 
दुश्मन
1973 
चरित्र 
चोर मचाये शोर 
चौकीदार 
धर्म
1974 
इम्तिहान 
अंजान राहें 
रोटी कपड़ा और मकान
चरित्रहीन
छोटे सरकार
1975 
अमानुष 
चैताली 1971 में इसी नाम की बंगाली फिल्म का रीमेक
ज़ोरो
1976
 बालिका बधु 
बजरंग बली 
गिन्नी और जॉनी 
बैराग
1977 
आनंद आश्रम 
अनुरोध (संगीत स्टेशन प्रबंधक) 
बंदी
1978 
घर 
देवता
1979 
जुर्मना 
छठ मैया की महिमा 
बॉम्बे बाय नाइट
1980 
जुदाई 
राम बलराम 
आंचल
1981 बरसात की एक रात 
1985 आर पार

Thursday, May 9, 2024

फिरोज दस्तूर (अभिनेता,गायक)

#30sep 
#09may 
फिरोज दस्तूर
🎂30 सितंबर 1919
बम्बई , बम्बई प्रेसीडेंसी , ब्रिटिश भारत

⚰️09 मई 2008 (आयु 88 वर्ष)
मुंबई , महाराष्ट्र, भारत
पेशा
गायक • अभिनेता

सक्रिय वर्ष
1941 – 2006
के लिए जाना जाता है
भारतीय शास्त्रीय संगीत
पुरस्कार
1986 में भारत सरकार द्वारा संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार,
तानसेन पुरस्कार
गुज़रे जमाने के फ़िल्म अभिनेता किराना घराने के गायक फिरोज़ दस्तूर 
 एक भारतीय फिल्म अभिनेता और किराना घराना (गायन शैली) से एक भारतीय शास्त्रीय गायक थे।

दस्तूर ने 1930 के दशक में भारतीय फिल्म उद्योग में काम किया, वाडिया मूवीटोन और अन्य द्वारा निर्मित कुछ फिल्मों में अभिनय किया।  1933 में, जब जेबीएच वाडिया के तहत वाडिया मूवीटोन ने अपनी पहली टॉकी फिल्म रिलीज की, तो उन्होंने फिल्म लाल-ए-यमन में बाल कलाकार के रूप में शास्त्रीय गीतों का प्रदर्शन किया। लेकिन उनका पहला प्यार भारतीय शास्त्रीय संगीत था।

वह सवाई गंधर्व के शिष्य थे, जिनके अन्य शिष्य भीमसेन जोशी और गंगूबाई हंगल थे, और कई वर्षों तक सवाई गंधर्व संगीत समारोह में एक नियमित कलाकार के रुप मे भाग लेते थे, यह सिलसिला 80 के दशक के अंत रहा

दस्तूर का संगीत अब्दुल करीम खान की शैली के बहुत करीब था।  उन्होंने कई छात्रों को संगीत सिखाया।

एक संक्षिप्त बीमारी के बाद मई 2008 में मुंबई में दस्तूर का निधन हो गया।  वह 89 वर्ष के थे

Wednesday, May 8, 2024

रंजीत चौधरी

#19sep 
#15april 
अभिनेता रणजीत चौधरी
19 सितंबर 1955, मुम्बई
मृत्यु की जगह और तारीख: 15 अप्रैल 2020, ब्रीच कैंडी हॉस्पिटल ट्रस्ट, मुम्बई
माता-पिता: पर्ल पदम्सी
भाई: राएल पदमसी, राहुल पदम्सी


दीपा मेहता की 2002 की फिल्म बॉलीवुड/हॉलीवुड में रॉकी की भूमिका के लिए , उन्हें 23वें जिनी अवार्ड्स में सहायक भूमिका में एक अभिनेता द्वारा सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए नामांकित किया गया था उनकी अन्य सबसे प्रसिद्ध भूमिका लास्ट हॉलीडे ( 2006), रानी लतीफा अभिनीत ।

रंजीत का जन्म और पालन-पोषण मुंबई में थिएटर पृष्ठभूमि वाले एक परिवार में हुआ, जहां उन्होंने कैंपियन स्कूल, मुंबई में अपनी प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की और अपने अभिनय करियर की शुरुआत की। उनके पिता एक गुज्जर पृष्ठभूमि से हैं, जबकि उनकी माँ, पर्ल पदमसी , अपनी माँ की ओर से आंशिक रूप से यहूदी वंश की थीं, लेकिन अपने जीवन के दौरान ईसाई बनी रहीं। उन्होंने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत बासु चटर्जी की खट्टा मीठा से की , जिसके बाद उन्होंने बासु चटर्जी की बातों बातों में (1979) और हृषिकेश मुखर्जी की खुबसूरत (1980) जैसी हिंदी कॉमेडी क्लासिक्स में प्रमुख भूमिकाएँ निभाईं। इसके बाद, वह 1980 के दशक की शुरुआत में संयुक्त राज्य अमेरिका चले गए। उन्होंने पटकथा लिखी और सैम एंड मी ( दीपा मेहता द्वारा निर्देशित ) में अभिनय किया, जिसने 1991 में कान्स में सम्मानजनक उल्लेख जीता। 

वह लॉ एंड ऑर्डर: स्पेशल विक्टिम्स यूनिट में एक अतिथि कलाकार थे , और द ऑफिस और प्रिज़न ब्रेक के दो सीज़न में दिखाई दिए थे ।

फिल्म कांटे में चौधरी के साथ काम करने वाले संजय गुप्ता ने ट्वीट किया कि उनका प्रदर्शन आनंददायक था और "खट्टा मीठा मेरा पसंदीदा है।" 


उनकी मां, पर्ल पदमसी , एक प्रसिद्ध थिएटर व्यक्तित्व, नाटक शिक्षक और मंच और फिल्म अभिनेत्री थीं। उनके सौतेले पिता, एलीक पदमसी , एक थिएटर अभिनेता और निर्देशक थे, जो मुंबई में एक विज्ञापन कंपनी के प्रमुख भी थे। उनकी एक बड़ी बहन थी जिसका नाम रोहिणी (सी. 1951 - 26 सितंबर 1961) था, जिसकी नेफ्रैटिस से मृत्यु हो गई।


चौधरी 2019 के अंत में एक दंत प्रक्रिया के लिए मुंबई में थे, और COVID-19 के प्रसार और संबंधित लॉकडाउन के कारण भारत में फंस गए थे।चौधरी को आंत में फटे अल्सर के कारण 14 अप्रैल 2020 को मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया गया था और उनकी आपातकालीन सर्जरी की गई थी। सर्जरी की जटिलताओं के कारण 15 अप्रैल 2020 को उनकी मृत्यु हो गई।


🎥

1978 खट्टा मीठा
1979 बैटन बैटन में
1980 खुबसूरत
1981 चक्र
1981 कालिया
1990 अमेरिका में अकेला
1991 सैम और मैं
1991 मिसिसिपी मसाला
1993 वह रात जो हम कभी नहीं मिले
1994 यह आप के साथ भी हो सकता था
1994 दस्यु रानी
1994 कैमिला
1994 मंत्रमुग्ध करनेवाला
1994 बूज़ेकेन
1995 पेरेज़ परिवार
1996 लड़की 6
1996 आग
1996 कामसूत्र: प्रेम की एक कहानी
1996 मैं रैपापोर्ट नहीं हूं
1997 उसका उसका
1998 इतनी लंबी यात्रा
1999 जल्द आ रहा है
2000 न्यूयॉर्क में शरद ऋतु
2000 जंगल का राजा
2002 बॉलीवुड/हॉलीवुड
2002 कांटे
2005 बिल्डिंग गर्ल
2006 पिछले छुट्टी
2006 अमेरिकी मिश्रण
2006 मछली की कड़ाही
2006 जेल से भागना
2006 आशा और थोड़ी सी चीनी
2007, 2009 कार्यालय
2009 आज के लिए ख़ास
2010 देवभूमि
2011 ब्रेक अवे

Sunday, May 5, 2024

टी आर राज कुमारी

टी आर राजकुमारी
#05may 
#20sep 
तंजावुर राधाकृष्णन राजयी
🎂05 मई 1922
तंजावुर , मद्रास प्रेसीडेंसी , ब्रिटिश भारत
मृत
⚰️20 सितंबर 1999 (उम्र 77)
चेन्नई , तमिलनाडु , भारत
सक्रिय वर्ष
1936-1963
अभिभावक)
पिता: राधाकृष्णन
माता: रंगनायकी
परिवार
टीएस दमयंती (बहन),
टीडी कुसलकुमारी (भतीजी),
टीआर रमन्ना (भाई)

तंजावुर राधाकृष्णन राजायी
जिन्हें उनके स्क्रीन नाम टीआर राजकुमारी के नाम से जाना जाता है , एक भारतीय अभिनेत्री, कर्नाटक गायिका और नर्तकी थीं। उन्हें तमिल सिनेमा की पहली "ड्रीमी गर्ल" कहा जाता है।
राजायी ने अपने फ़िल्मी करियर की शुरुआत " कुमारा कुलोथुंगन" से की, जो 1938-39 में निर्मित हुई थी, लेकिन कचा देवयानी के बाद 1941 में रिलीज़ हुई थी । शुरुआती विज्ञापनों में उनका नाम टीआर राजायी बताया गया लेकिन बाद में फिल्म में उनका नाम टीआर राजलक्ष्मी बताया गया। उनकी दूसरी फिल्म डीएस मार्कोनी द्वारा निर्देशित मंधारावती थी जो 1941 में रिलीज हुई थी।कचा देवयानी (1941) हिट रही और इससे उन्हें फिल्मों में अपना करियर शुरू करने में मदद मिली। इस बात को लेकर कुछ भ्रम है कि उन्होंने वास्तव में किस फिल्म में कचा देवयानी के निर्देशक के रूप में अपनी शुरुआत की थी। सुब्रमण्यम ने बाद में जोर देकर कहा कि वह वही थे जिन्होंने उन्हें फिल्मों में पेश किया था।1944 में, राजकुमारी ने एमके त्यागराज भागवतर के साथ रिकॉर्ड तोड़ने वाली फिल्म हरिदास में अभिनय किया और अपने ग्लैमरस चित्रण के लिए पहचान हासिल की।

अपने तमिल फिल्म करियर में, राजकुमारी ने त्यागराज भागवतर, टीआर महालिंगम , केआर रामासामी , पीयू चिन्नप्पा , एमजी रामचंद्रन और शिवाजी गणेशन सहित कई प्रमुख फिल्म सितारों के साथ मुख्य महिला कलाकार के रूप में काम किया । उन्होंने (अपने भाई टीआर रमन्ना के साथ) "आरआर पिक्चर्स" नामक एक फिल्म निर्माण कंपनी भी शुरू की और वाजापिरंधवन (1953), 
कूंडुक्किली (1954), गुल-ए-बागावली (1955), पासम (1962), 
पेरिया इदाथु पेन जैसी फिल्मों का निर्माण किया। (1963), पनम पदैथावन (1965) और परक्कुम पावई (1966)। एक अभिनेत्री के रूप में उनकी आखिरी फिल्म वनंबदी (1963) थी। 
राजकुमारी का लंबी बीमारी के बाद 20 सितंबर 1999 को निधन हो गया। 
🎥
1935 कारवां-ए-हयात हिन्दी
उर्दू
1936 देवदास हिंदी
1948 चंद्रलेखा हिंदी
1954 मनोहरा हिंदी
1955 राजकुमारी हिंदी

टी आर राज कुमारी

टी आर राजकुमारी
#05may 
#20sep 
तंजावुर राधाकृष्णन राजयी
🎂05 मई 1922
तंजावुर , मद्रास प्रेसीडेंसी , ब्रिटिश भारत
मृत
⚰️20 सितंबर 1999 (उम्र 77)
चेन्नई , तमिलनाडु , भारत
सक्रिय वर्ष
1936-1963
अभिभावक)
पिता: राधाकृष्णन
माता: रंगनायकी
परिवार
टीएस दमयंती (बहन),
टीडी कुसलकुमारी (भतीजी),
टीआर रमन्ना (भाई)

तंजावुर राधाकृष्णन राजायी
जिन्हें उनके स्क्रीन नाम टीआर राजकुमारी के नाम से जाना जाता है , एक भारतीय अभिनेत्री, कर्नाटक गायिका और नर्तकी थीं। उन्हें तमिल सिनेमा की पहली "ड्रीमी गर्ल" कहा जाता है।
राजायी ने अपने फ़िल्मी करियर की शुरुआत " कुमारा कुलोथुंगन" से की, जो 1938-39 में निर्मित हुई थी, लेकिन कचा देवयानी के बाद 1941 में रिलीज़ हुई थी । शुरुआती विज्ञापनों में उनका नाम टीआर राजायी बताया गया लेकिन बाद में फिल्म में उनका नाम टीआर राजलक्ष्मी बताया गया। उनकी दूसरी फिल्म डीएस मार्कोनी द्वारा निर्देशित मंधारावती थी जो 1941 में रिलीज हुई थी।कचा देवयानी (1941) हिट रही और इससे उन्हें फिल्मों में अपना करियर शुरू करने में मदद मिली। इस बात को लेकर कुछ भ्रम है कि उन्होंने वास्तव में किस फिल्म में कचा देवयानी के निर्देशक के रूप में अपनी शुरुआत की थी। सुब्रमण्यम ने बाद में जोर देकर कहा कि वह वही थे जिन्होंने उन्हें फिल्मों में पेश किया था।1944 में, राजकुमारी ने एमके त्यागराज भागवतर के साथ रिकॉर्ड तोड़ने वाली फिल्म हरिदास में अभिनय किया और अपने ग्लैमरस चित्रण के लिए पहचान हासिल की।

अपने तमिल फिल्म करियर में, राजकुमारी ने त्यागराज भागवतर, टीआर महालिंगम , केआर रामासामी , पीयू चिन्नप्पा , एमजी रामचंद्रन और शिवाजी गणेशन सहित कई प्रमुख फिल्म सितारों के साथ मुख्य महिला कलाकार के रूप में काम किया । उन्होंने (अपने भाई टीआर रमन्ना के साथ) "आरआर पिक्चर्स" नामक एक फिल्म निर्माण कंपनी भी शुरू की और वाजापिरंधवन (1953), 
कूंडुक्किली (1954), गुल-ए-बागावली (1955), पासम (1962), 
पेरिया इदाथु पेन जैसी फिल्मों का निर्माण किया। (1963), पनम पदैथावन (1965) और परक्कुम पावई (1966)। एक अभिनेत्री के रूप में उनकी आखिरी फिल्म वनंबदी (1963) थी। 
राजकुमारी का लंबी बीमारी के बाद 20 सितंबर 1999 को निधन हो गया। 
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1935 कारवां-ए-हयात हिन्दी
उर्दू
1936 देवदास हिंदी
1948 चंद्रलेखा हिंदी
1954 मनोहरा हिंदी
1955 राजकुमारी हिंदी

Saturday, May 4, 2024

सतीश कोल



#08sep 
#19april 
सतीश कौल
पूरा नाम सतीश कौल
🎂जन्म 8 सितंबर, 1948
जन्म भूमि कश्मीर, भारत
⚰️मृत्यु 10 अप्रॅल, 2021
मृत्यु स्थान लुधियाना, पंजाब
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र हिन्दी व पंजाबी सिनेमा
मुख्य फ़िल्में 'कर्मा', 'राम लखन', 'प्यार तो होना ही था', 'आंटी नं. 1', 'आजादी', 'शेरा दे पुत्त शेर', 'मौला जट्ट', 'गुड्डो', 'पटोला' और 'पींगा प्यार दीयां' आदि।
पुरस्कार-उपाधि लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड
प्रसिद्धि अभिनेता
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी सतीश कौल ने बी. आर. चोपड़ा की महाभारत में काम करने से लेकर सदी के महानायक तक के साथ काम किया था।
हिंदी और पंजाबी फिल्मों के जाने-पहचाने अभिनेता थे। वह लंबे समय से लुधियाना में रह रहे थे। वे साल 2011 में मुंबई छोड़कर पंजाब चले गए थे और उन्होंने वहां एक्टिंग स्कूल खोल लिया था। सतीश कौल की फिल्मों की बात करें तो उन्होंने 'कर्मा', 'राम लखन', 'प्यार तो होना ही था', 'आंटी नं. 1' जैसी फिल्मों में काम किया। 
पुरस्कार

पीटीसी पंजाबी फिल्म अवॉर्ड्स में सतीश कौल को लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से नवाजा गया था। सतीश अपनी जिंदगी में कुछ सबसे बड़े प्रोजेक्ट्स का हिस्सा रहे हैं। उन्होंने बी. आर. चोपड़ा की महाभारत में काम करने से लेकर सदी के महानायक तक के साथ काम किया था।

मशहूर पंजाबी अभिनेता सतीश कौल का निधन 10 अप्रॅल, 2021 को हुआ। उनका लुधियाना के मॉडल टाउन एक्सटेंशन स्थित श्मशान घाट में अंतिम संस्कार कर दिया गया। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की तरफ से पीएमआईडीबी चेयरमैन के.के. बाबा अंतिम श्रद्धांजलि देने पहुंचे थे। पॉलीवुड में 300 फिल्मों में अभिनय करने वाले सतीश कौल बीते कुछ साल से गुमनामी की जिंदगी जी रहे थे। पहले वह लुधियाना के एक वृद्ध आश्रम में रहते रहे, अब बीते कुछ साल से उनकी प्रशंसक सत्या देवी ही उनकी देखभाल कर रहीं थीं। दोनों ही एक किराये के घर में रह रहे थे। उनकी आर्थिक हालत इस कदर खराब हो चुकी थी कि 2019 में उन्हें आम लोगों से सहायता मांगने की नौबत आ गई थी। उस समय पंजाब सरकार ने उन्हें पांच लाख रुपये दिए थे।

कूल्हे में फ्रैक्चर होने के कारण वह काफी समय से बीमार चल रहे थे। 8 अप्रैल को उन्हें बीमार होने के कारण लुधियाना के चैरिटेबल अस्पताल में भर्ती कराया गया था। यहां उपचार के दौरान पता चला कि वह कोरोना संक्रमित भी हैं। शनिवार बाद दोपहर उनका देहांत हो गया था।
बड़ी हिट फिल्में
हिंदी और पंजाबी फिल्मों के अभिनेता सतीश कौल ने निम्न फ़िल्मों में अभिनय किया था-

'प्यार तो होना ही था' (1998)
आंटी नं. 1 (1998)
जंजीर (1998)
याराना (1995)
ऐलान (1994)
इल्जाम (1986)
शिवा का इंसाफ (1985)
कसम
पंजाबी फिल्मों की बात करें तो सतीश कौल 'आजादी', 'शेरा दे पुत्त शेर', 'मौला जट्ट', 'गुड्डो', 'पटोला' और 'पींगा प्यार दीयां' जैसी फिल्मों का हिस्सा रहे।

Thursday, May 2, 2024

सितंबर


विवरण ग्रेगोरी कैलंडर के अनुसार वर्ष का नौवाँ महीना है।
हिंदी माह भाद्रपद - आश्विन
हिजरी माह ज़िलक़ाद - ज़िलहिज्ज
कुल दिन 30
व्रत एवं त्योहार गणेश चतुर्थी (भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी), ऋषि पंचमी, राधा अष्टमी, वामन जयन्ती
जयंती एवं मेले तार्णेतर मेला (गुजरात में), फुलाइच (हिमाचल प्रदेश में)
महत्त्वपूर्ण दिवस शिक्षक दिवस (05), विश्व साक्षरता दिवस (08), हिन्दी दिवस (14), अभियंता दिवस (15), विश्व बधिर दिवस (24), पर्यटन दिवस (27)
पिछला अगस्त
अगला अक्टूबर
अन्य जानकारी सितंबर वर्ष के उन चार महीनों में से एक है जिनके दिनों की संख्या 30 होती है।
विवरण

मालिका तरनूम(जनम)

नूरजहाँ  🎂जन्म 21 सितम्बर, 1926 ⚰️23 दिसम्बर, 2000  महान गायिका मल्लिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ  🎂जन्म 21 सितम्बर, 1926 ई. ⚰️23 दिसम्बर, 2000  न...