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Monday, September 16, 2024

MS सुब्बुलक्ष्मी

#16sep #11dic 
एम एस सुब्बुलक्ष्मी 
🎂16 सितंबर 1916, मदुरै
⚰️11 दिसंबर 2004, चेन्नई
पति: कल्कि सदासिवम
इनाम: भारत रत्‍न, पद्म विभूषण, पद्म भूषण,
बच्चे: राधा विस्वनाथन
पार्श्वगायिका शास्त्रीय संगीत गायिका एम एस सुब्बुलक्ष्मी 
षण्मुखवडिवु सुब्बुलक्ष्मी अथवा एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी (जन्म- 16 सितंबर, 1916 मद्रास; मृत्यु- 11 दिसंबर, 2004 चेन्नई) को कर्नाटक संगीत का पर्याय माना जाता है और भारत की वह ऐसी पहली गायिका थीं, जिन्हें सर्वोच्च नागरिक अलंकरण भारत रत्न से सम्मानित किया गया। उनके गाये हुए गाने, ख़ासकर भजन आज भी लोगों के बीच काफ़ी लोकप्रिय हैं। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें संगीत की रानी बताया तो वहीं स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर ने उन्हें 'तपस्विनी' कहा।

सुब्बुलक्ष्मी का जन्म मंदिरों के शहर मदुरै, मद्रास प्रेसीडेंसी, ब्रिटिश राज में 16 सितम्बर1916 को वीणा वादक षण्मुखवडिवु (लेखाधिकारी के यहाँ उनकी माता का नाम और जन्म स्थान ही अंकित है) के यहाँ हुआ। उनका बचपन का नाम 'कुंजाम्मा' था। उनकी नानी अक्काम्मल वायलिन वादक थीं। उनका प्रसिद्ध नाम एम.एस. था। बचपन में कुंजाम्मा अपने छोटे भाई और बहन के साथ संगीत के वातावरण में पले बढे। उनका घर मीनाक्षी मंदिर के पास ही था। एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी देवदासी परिवार में उत्पन्न हुईं। 17 वर्ष की आयु में उन्होंने 'चेन्नई संगीत अकादमी' में एक श्रेष्ठ गायिका के रूप में अपना नाम दर्ज करा लिया था। प्रारम्भ से ही उनके मन में अपने संगीत के सम्बन्ध में यह भावना थी कि, उनके संगीत को सुनकर मुरझाए हुए चेहरों पर परमानन्द की झलक दिखाई दे

पहला एलबम

सुब्बुलक्ष्मी बचपन में ही कर्नाटक संगीत से जुड़ गयी थीं और उनका पहला एलबम महज दस साल की उम्र में निकला था। प्रसिद्ध संगीताचार्य 'सेम्मनगुडी श्रीनिवास अय्यर' से संगीत की शिक्षा ग्रहण करने के बाद उन्होंने 'पंडित नारायण राव' से शास्त्रीय संगीत की

सुब्बुलक्ष्मी ने पहली बार सार्वजनिक तौर पर अपने गायन का प्रदर्शन एक समारोह के दौरान किया। इसके बाद वह आगे की पढ़ाई के लिए 'मद्रास संगीत अकादमी' चली गयी, जहाँ सिर्फ 17 साल की उम्र में भव्य कार्यक्रम
आयोजित किये। उन्होंने कन्नड़ के अलावा तमिल, मलयालम , तेलुगू, हिंदी, संस्कृत , बंगाली और गुजराती में भी गीत गाए। उन्होंने 1945 में 'भक्त मीरा' नामक फ़िल्म में बेहतरीन भूमिका अदा की। उन्होंने मीरा के भजन को अपने सुरों में पिरोया, जो आज तक लोगों द्वारा सुने जाते है

विवाह

सन 1936 में वह 'स्वतंत्रता सेनानी सदाशिवम' से मिलीं और 1940 में उनकी जीवन संगिनी बन गयीं। सदाशिवम के अपनी पहली पत्नी से चार बच्चे थे जिन्हें सुब्बुलक्ष्मी ने अपनी संतान की तरह पाला।

प्रशंसा के नाम

अनेक मशहूर संगीतकारों ने श्रीमती सुब्बुलक्ष्मी की कला की तारीफ़ की है। -
लता मंगेशकर ने आपको 'तपस्विनी' कहा,
उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ां ने आपको 'सुस्वरलक्ष्मी' पुकारा,
किशोरी अमोनकर ने आपको 'आठ्वां सुर' कहा, जो संगीत के सात सुरों से ऊंचा है।
एमएस लावण्या एवं एमएस सुबुलक्ष्मी को लोग 'सेक्‍सोफोन सिस्‍टर' के नाम से ज्यादा जानते हैं
भारत के कई माननीय नेता, जैसे महात्मा गांधी और पंडित नेहरु भी आपके संगीत के प्रशंसक थे। एक अवसर पर महात्मा गांधी ने कहा कि अगर श्रीमती सुब्बुलक्ष्मी 'हरि, तुम हरो जन की भीर' इस मीरा भजन को गाने के बजाय बोल भी दें, तब भी उनको वह भजन किसी और के गाने से अधिक सुरीला लगेगा।

श्रीमती सुब्बुलक्ष्मी पहली भारतीय हैं जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ (United Nations) की सभा में संगीत कार्यक्रम प्रस्तुत किया, तथा आप पहली स्त्री हैं जिनको कर्णाटक संगीत का सर्वोत्तम पुरस्कार, संगीत कलानिधि प्राप्त हुआ।

सम्मान और पुरस्कार

सुब्बुलक्ष्मी के सम्मान में जारी डाक टिकट
भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किए जाने के अतिरिक्त उन्हें मद्रास संगीत अकादमी ने संगीत कलानिधि की उपाधि से अंलकृत किया था। यह सम्मान प्राप्त करने वाली वह प्रथम महिला थीं। 1974 में उन्हें ‘रेमन मेगसेसे’ पुरस्कार प्राप्त हुआ और 1990 में राष्ट्रीय एकता के लिए उन्हें इंदिरा गांधी अवार्ड दिया गया।

1954 में पद्म भूषण
1956 में संगीत नाटक अकादमी सम्मान
1974 में रैमन मैग्सेसे सम्मान
1975 में पद्म विभूषण
1988 में कैलाश सम्मान
1998 में भारत रत्न समेत कई सम्मानों से नवाजा गया। इसके अतिरिक्त कई विश्वविद्यालयों ने उन्हें मानद उपाधि से सम्मानित किया।

88 साल की उम्र में महान् गायिका एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी 11 दिसंबर, 2004 को दुनिया को अलविदा कह गयीं।

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