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Sunday, September 14, 2025

शरतचंद्र चट्टोपाध्याय

शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय 🎂15 सितम्बर, 1876 ⚰️16 जनवरी,1938
15 सितम्बर 1876
शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय
🎂15 सितंबर 1876, देबनान्दापुर, बंडल
⚰️ 16 जनवरी 1938, कोलकाता
पत्नी: हिरोन्मोयि देवी (विवा. 1910–1938), ज़्यादा
माता-पिता: मोतीलाल चट्टोपाध्याय, भुवनमोहिनी देवी
भाई: स्वामी वेदानान्दा
आंदोलन: बंगाली पुनर्जागरण
शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय बांग्ला के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार एवं लघुकथाकार थे। वे बांग्ला के सबसे लोकप्रिय उपन्यासकार हैं। उनकी अधिकांश कृतियों में गाँव के लोगों की जीवनशैली, उनके संघर्ष एवं उनके द्वारा झेले गए संकटों का वर्णन है। इसके अलावा उनकी रचनाओं में तत्कालीन बंगाल के सामाजिक जीवन की झलक मिलती है। शरतचंद्र भारत के सार्वकालिक सर्वाधिक लोकप्रिय तथा सर्वाधिक अनूदित लेखक थे।
उनका जन्म हुगली जिले के देवानन्दपुर में हुआ। वे अपने माता-पिता की 9सन्तानों में से एक थे। उनका बाल्यकाल देवानन्दपुर में तथा कैशोर्य भागलपुर में व्यतीत हुआ। घर में बच्चों का ठीक-ठीक शासन नहीं हो पाता था। पाँच वर्ष की अवस्था में ही देवानन्दपुर के 'प्यारी पंडित की पाठशाला' में प्रवेश कराया। भागलपुर में शरतचन्द्र का ननिहाल था। नाना केदारनाथ गांगुली का आदमपुर में अपना मकान था और उनके परिवार की गिनती खाते-पीते सभ्रांत बंगाली परिवार के रूप में होती थी। नाना कई भाई थे और संयुक्त परिवार में एक साथ रहते थे। इसलिए मामा तथा मौसियों की संख्या काफी थी। छोटे नाना अघोरनाथ गांगुली का बेटा मणिन्द्रनाथ उनका सहपाठी था।

पिता मतिलाल बेफिक्र स्वभाव के थे और किसी नौकरी में टिक पाना उनके वश की बात की बात नहीं थी। परिणामस्वरूप परिवार गरीबी के गर्त में चला गया और उन्हें बाल बच्चों के साथ देवानन्दपुर छोड़कर अपने ससुराल में (भागलपुर) रहना पड़ा। इस कारण शरत्चन्द्र का बचपन भागलपुर में गुजरा और पढ़ाई-लिखाई भी यहीं हुई।

गरीबी और अभाव में पलने के बावजूद शरत् दिल के आला और स्वभाव के नटखट थे। वे अपने समवयस्क मामाओं और बाल सखाओं के साथ खूब शरारातें किया करते थे। कथाशिल्पी शरत् के प्रसिद्ध पात्र देवदास, श्रीकान्त, सत्यसाची, दुर्दान्त राम आदि के चरित्र को झांके तो उनके बचपन की शरारतें सहज दिख जाएंगी। जब शरत भागने लायक उम्र के हुए तो जब-तब पढ़ाई-लिखाई छोड़कर भाग निकलते थे। इसपर कोई विशेष शोर नहीं मचता था, पर जब वह लौटकर आते तो उनपर मार पड़ती थी।

सन् 1883में शरत्चन्द्र का दाखिला भागलपुर दुर्गाचरण एम०ई० स्कूल की छात्रवृति क्लास में कराया गया। नाना केदारनाथ गांगुली इस विद्यालय के मंत्री थे। छात्रवृत्ति पाकर शरत् ने टी. एन. जुबिली कालेजिएट स्कूल में प्रवेश किया। उनकी प्रतिभा उत्तरोत्तर विकसित होती गयी। 1893ई. में हुगली स्कूल के विद्यार्थी रहने के समय उनकी साहित्य-साधना का सूत्रपात हुआ।  1894ई. में उन्होने एन्ट्रेन्स परीक्षा (दसवीं कक्षा के बाद होने वाली सार्वजनिक परीक्षा) द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण की। इसी समय भागलपुर की साहित्य-सभा की उन्होंने स्थापना की। सभा का मुखपत्र हस्तलिखित मासिकपत्र ‘छाया' था। इन्हीं दिनों उन्होंने "बासा" (घर) नाम से एक उपन्यास लिख डाला, पर यह रचना प्रकाशित नहीं हुई। उनकी कालेज की पढ़ाई बीच में ही रह गई।

कॉलेज त्यागकर 1896ई. से लेकर1899ई. तक शरत्चन्द्र भागलपुर शहर के आदमपुर क्लब के सदस्ययों के सङ्ग खेलकूद एवं अभिनय ककके समय काटते रहे। इसी समय बिभूतिभूषण भट्ट के घर से उन्होने एक साहित्यसभा का संचालन किया जिसके फलस्वरूप उन्होने 'बड़दिदि', 'देबदास', 'चन्द्रनाथ', 'शुभदा' इत्यादि उपन्यास एवं 'अनुपमार प्रेम', 'आलो ओ छाया', 'बोझा', 'हरिचरण' इत्यादि गल्प की रचना की। इसी समय उन्होने 'बनेली एस्टेट' में कुछ दिन नौकरी की। किन्तु  1900ई में पिता के ऊपर किसी कारण नाराज होकर वे सन्यासी वेष में घर छोड़ चले गए। इसी समय उनके पिता की मृत्यु हो गयी और उन्होने भागलपुर वापस आकर पिता का श्राद्ध किया और उसके बाद १९०२ ई. में अपने मामा लालमोहन गंगोपाध्याय के पास कलकत्ता आ पहुँचे जो कलकत्ता उच्च न्यायालय के वकील थे। उनके ही घर रहकर वे हिन्दी पुस्तकों का अंग्रेजी अनुवाद करने लगे जिसके लिए उन्हे तीस रूपए प्रतिमाह मिलते थे। इसी समय उन्होने 'मन्दिर' नाम का एक गल्प लिखकर 'कुन्तलीन' नामक प्रतियोगिता में भेजा जिसमें वे विजयी घोषित हुए।

छः मास लालमोहन गंगोपाध्याय के घर रहने के बाद शरत्चन्द्र 1903ई के जनवरी मास में रंगून में लालमोहन गङ्गोपाध्याय के बहनोई वकील अघोरनाथ चट्टोपाध्यायेर के घर चले आए। अघोरनाथ उनके लिए बर्मा रेलवे के अडिट अफिस में एक अस्थायी नौकरी की व्यवस्था कर दिए। इन दिनों उनका संपर्क बंगचंद्र नामक एक व्यक्ति से हुआ जो था तो बड़ा विद्वान् पर शराबी और उछृंखल था। यहीं से चरित्रहीन का बीज पड़ा, जिसमें मेस जीवन के वर्णन के साथ मेस की नौकरानी (सावित्री) से प्रेम की कहानी है। दो वर्ष वह नौकरी करने के बाद वे उनके बन्धु गिरीन्द्रनाथ सरकार के आथ पेगु चले गए और वहाँ अबिनाश चट्टोपाध्याय के घर निवास किया।1906 ई के अप्रैल मास में बर्मा के पब्लिक वर्क्स एकाउण्ट्स ऑफिस के डिप्टी एग्जामिनर मणीन्द्रनाथ मित्र की सहायता से शरत्चन्द्र रंगून के इस ऑफिस में नौकरी पा गए और आगे के दस वर्ष यह नौकरी करते रहे।

1912 ई के अक्टूबर मास में शरत्चन्द्र एक मास की छुट्टी लेकर घर लौटे तो 'यमुना' नामक पत्रिका के सम्पादक फणीन्द्रनाथ पाल ने अपनी पत्रिका के लिए उनसे लेख भेजने का अनुरोध किया। उसके अनुसार रंगून वापस जाने के बाद शरत्चन्द्र ने 'रामेर सुमति' नामक कहानी भेजी जो यमुना पत्रिका में बंगाब्द 1319के फाल्गुन और चैत्र अंक में प्रकाशित हुई। इसके बाद उन्होंने 'भारतवर्ष' नामक पत्रिका के लिए भी लेख भेजना शुरू किया। फणीन्द्रनाथ पाल ने उनका 'बड़ दिदि' नामक उपन्यास पुस्तक रूप में प्रकाशित किया (1913ई)। यह शरत् की प्रथम मुद्रित पुस्तक है। एमसी सरकार और संस तथा गुरुदास चट्टोपाध्याय एंड संस ने उनके उपन्यासों को पुस्तक रूप में प्रकाशित किया।

1915ई. में शरत् का ‘यमुना' पत्रिका से सम्बन्ध-विच्छेद हुआ, और इसके उपरान्त वे नियमित रूप से ‘भारतवर्ष में लिखने लगे।1916ई में छुट्टी को लेकर हुए मनोमालिन्य के कारण शरत्चन्द्र नौकरी त्याग कर रंगून से घर वापस आ गए और वाजे-शिवपुर में रहने लगे।

बर्मा से लौटने के बाद उन्होंने अपना प्रसिद्ध उपन्यास 'श्रीकान्त' लिखना शुरू किया।जो1917 में प्रकाशित हुआ।

1921ई. में उन्होंने कांग्रेस के आन्दोलन में योगदान किया। 1922 ई. में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से ‘श्रीकान्त' (प्रथम पर्व) का अंग्रेज़ी रूपान्तर प्रकाशित हुआ। इसके बाद से शरत् के यश में उत्तरोत्तर वृद्धि होने लगी। अनेक सभाओं तथा संस्थाओं के वे अध्यक्ष तथा मान्य सदस्य बनाये जाने लगे।  1936ई. में ढाका विश्वविद्यालय ने उन्हें आनरेरी डी. लिट्. की उपाधि प्रदान की। अपने जीवन के उत्तर काल में शरत् रवीन्द्रनाथ के भी स्नेह तथा प्रशंसा के भागी रहे।

16जनवरी1938ई. को कलकत्ता पार्क नसिंग होम में 62 वर्ष की अवस्था में शरच्चन्द्र का निधन हुआ। विष्णु प्रभाकर द्वारा अवारा मसीहा शीर्षक रचित से उनका प्रामाणिक जीवन परिचय बहुत प्रसिद्ध है।

📚उनके उपन्यास

उपन्यास
 करें
बड़दिदि, १९१३
बिराजबौ, १९१४
परिणीता, १९१४
बैकुन्ठेर उइल, १९१५
पल्लीसमाज, ११६
चन्द्रनाथ, १९१६
अरक्षणीया, १९१६
पन्डितमशाइ, १९१७
देवदास, १९१७
चरित्रहीन, १९१७
श्रीकान्त १, १९१७
निष्कृति, १९१७
श्रीकान्त २, १९१८
दत्ता, १९१८
गृहदाह, १९२०
बामुनेर मेये, १९२०
देना पाओना, १९२३
नबबिधान, १९२४
पथेर दाबी, १९२६
श्रीकान्त ३, १९२७
शेष प्रश्न, १९३१
बिप्रदास, १९३५
श्रीकान्त ४, १९३३
शुभदा, १९३८
शेषेर परिचय, १९३९

🔰उनके नाटक

षोड़शी, १९२८
रमा, १९२८
बिराज बौ, १९३४
बिजया, १९३५

गल्प

रामेर सुमति, १९१४
बिन्दुर छेले, १९१४
पथ-निर्देश, १९१४
मेजदिदि, १९१५
आधाँरे आलो, १९१५
दर्पचूर्ण, १९१५
काशीनाथ, १९१७
छबि, १९२०
बिलासी, १९२०
मामलार फल, १९२०
हरिलक्षी, १९२६
महेश, १९२६
अभागीर स्बर्ग, १९२६
अनुराधा, १९३४
सती, १९३६
परेश, १९३६

✍️निबन्ध

नारीर मूल्य
तरुणेर बिद्रोह, १९१९
स्बदेश ओ साहित्य, १९३२
स्बराज साधनाय नारी
शिक्षार बिरोध
स्मृतिकथा
अभिनन्दन
भबिष्यत् बंग-साहित्य
गुरु-शिष्य संबाद
साहित्य ओ नीति
साहित्ये आर्ट ओ दुर्नीति
भारतीय उच्च संगीत

🎥 चलचित्र 

शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के कई रचनाओं का कई भारतीय भाषाओं में पचास फिल्मों में रूपान्तरण हुआ हैं। विशेष रूप से, उनके उपन्यास देवदास को सोलह संस्करणों में बनाया गया है तथा परिणीता को  बंगाली, हिंदी और तेलगु में दो बार बनाया गया है। ऋषिकेश मुखर्जी द्वारा 1967 में निर्मित मझली दीदी तथा स्वामी (1977) को सर्वश्रेष्ठ कहानी के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। एक और प्रसिद्ध फिल्म छोटी बहू (1971) अपने उपन्यास बिंदुर छेले पर आधारित है। उनके उपन्यास 'दत्ता' को बंगाली फिल्म (1976) में सुचित्रा सेन और सौमित्र चटर्जी की प्रमुख भूमिकाओं में अभिनय किया गया था। 

उनके उपन्यास पर आधारित अन्य फिल्मों में निष्कृति, और अपना पराया (1980) हैं, जो अमोल पालेकर मुख्य  भूमिका में हैं। तेलुगू फिल्म थोडी कोडल्लू (1957) भी इस उपन्यास पर आधारित है। गुलजार की 1975 की फ़िल्म, खुशबू उनकी रचना पंडित मशाय से प्रेरित हैं। आचार्य अत्रेय द्वारा 1961 तेलुगू फिल्म वाग्दानम उनके उपन्यास दत्ता पर आधारित है। इसके अलावा 2011 की फिल्म आलो छाया उनकी छोटी कहानी, आलो ओ छाया पर आधारित है।
शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय 
🎂15 सितम्बर, 1876 ⚰️16 जनवरी,1938
15 सितम्बर 1876
देवानन्दपुर, हुगली जिला, बंगाल प्रेसिडेंसी, भारत
(अब, पश्चिम बंगाल)
मौत
16 जनवरी 1938 (उम्र 61 वर्ष)
कोलकाता, बंगाल प्रेसिडेंसी, भारत
दूसरे नाम
अनिला देवी
पेशा
लेखक, उपन्यासकार
भाषा
बांग्ला
राष्ट्रीयता
भारतीय
काल
१९वीं-२०वीं शताब्दी
आंदोलन
बंगाली पुनर्जागरण
उल्लेखनीय कामs
पंडित मोशाय, बैकुंठेर बिल,
मेज दीदी, दर्पचूर्ण, श्रीकांत, अरक्षणीया, निष्कृति,
मामलार फल, गृहदाह, शेष प्रश्न, दत्ता, देवदास

बांग्ला के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार एवं लघुकथाकार थे। वे बांग्ला के सबसे लोकप्रिय उपन्यासकार हैं। उनकी अधिकांश कृतियों में गाँव के लोगों की जीवनशैली, उनके संघर्ष एवं उनके द्वारा झेले गए संकटों का वर्णन है। इसके अलावा उनकी रचनाओं में तत्कालीन बंगाल के सामाजिक जीवन की झलक मिलती है। शरतचंद्र भारत के सार्वकालिक सर्वाधिक लोकप्रिय तथा सर्वाधिक अनूदित लेखक हैं।

उनका जन्म हुगली जिले के देवानन्दपुर में हुआ। वे अपने माता-पिता की 9 सन्तानों में से एक थे। उनका बाल्यकाल देवानन्दपुर में तथा कैशोर्य भागलपुर में व्यतीत हुआ। घर में बच्चों का ठीक-ठीक शासन नहीं हो पाता था। पाँच वर्ष की अवस्था में ही देवानन्दपुर के 'प्यारी पंडित की पाठशाला' में प्रवेश कराया। भागलपुर में शरतचन्द्र का ननिहाल था। नाना केदारनाथ गांगुली का आदमपुर में अपना मकान था और उनके परिवार की गिनती खाते-पीते सभ्रांत बंगाली परिवार के रूप में होती थी। नाना कई भाई थे और संयुक्त परिवार में एक साथ रहते थे। इसलिए मामा तथा मौसियों की संख्या काफी थी। छोटे नाना अघोरनाथ गांगुली का बेटा मणिन्द्रनाथ उनका सहपाठी था।

पिता मतिलाल बेफिक्र स्वभाव के थे और किसी नौकरी में टिक पाना उनके वश की बात की बात नहीं थी। परिणामस्वरूप परिवार गरीबी के गर्त में चला गया और उन्हें बाल बच्चों के साथ देवानन्दपुर छोड़कर अपने ससुराल में (भागलपुर) रहना पड़ा। इस कारण शरत्चन्द्र का बचपन भागलपुर में गुजरा और पढ़ाई-लिखाई भी यहीं हुई।

गरीबी और अभाव में पलने के बावजूद शरत् दिल के आला और स्वभाव के नटखट थे। वे अपने समवयस्क मामाओं और बाल सखाओं के साथ खूब शरारातें किया करते थे। कथाशिल्पी शरत् के प्रसिद्ध पात्र देवदास, श्रीकान्त, सत्यसाची, दुर्दान्त राम आदि के चरित्र को झांके तो उनके बचपन की शरारतें सहज दिख जाएंगी। जब शरत भागने लायक उम्र के हुए तो जब-तब पढ़ाई-लिखाई छोड़कर भाग निकलते थे। इसपर कोई विशेष शोर नहीं मचता था, पर जब वह लौटकर आते तो उनपर मार पड़ती थी।

सन् 1883 में शरत्चन्द्र का दाखिला भागलपुर दुर्गाचरण एम०ई० स्कूल की छात्रवृति क्लास में कराया गया। नाना केदारनाथ गांगुली इस विद्यालय के मंत्री थे। छात्रवृत्ति पाकर शरत् ने टी. एन. जुबिली कालेजिएट स्कूल में प्रवेश किया। उनकी प्रतिभा उत्तरोत्तर विकसित होती गयी। 1893ई. में हुगली स्कूल के विद्यार्थी रहने के समय उनकी साहित्य-साधना का सूत्रपात हुआ।  1894ई. में उन्होने एन्ट्रेन्स परीक्षा (दसवीं कक्षा के बाद होने वाली सार्वजनिक परीक्षा) द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण की। इसी समय भागलपुर की साहित्य-सभा की उन्होंने स्थापना की। सभा का मुखपत्र हस्तलिखित मासिकपत्र ‘छाया' था। इन्हीं दिनों उन्होंने "बासा" (घर) नाम से एक उपन्यास लिख डाला, पर यह रचना प्रकाशित नहीं हुई। उनकी कालेज की पढ़ाई बीच में ही रह गई।

कॉलेज त्यागकर1896 ई. से लेकर 1899ई. तक शरत्चन्द्र भागलपुर शहर के आदमपुर क्लब के सदस्ययों के सङ्ग खेलकूद एवं अभिनय ककके समय काटते रहे। इसी समय बिभूतिभूषण भट्ट के घर से उन्होने एक साहित्यसभा का संचालन किया जिसके फलस्वरूप उन्होने 'बड़दिदि', 'देबदास', 'चन्द्रनाथ', 'शुभदा' इत्यादि उपन्यास एवं 'अनुपमार प्रेम', 'आलो ओ छाया', 'बोझा', 'हरिचरण' इत्यादि गल्प की रचना की। इसी समय उन्होने 'बनेली एस्टेट' में कुछ दिन नौकरी की। किन्तु  1900ई में पिता के ऊपर किसी कारण नाराज होकर वे सन्यासी वेष में घर छोड़ चले गए। इसी समय उनके पिता की मृत्यु हो गयी और उन्होने भागलपुर वापस आकर पिता का श्राद्ध किया और उसके बाद 1902ई. में अपने मामा लालमोहन गंगोपाध्याय के पास कलकत्ता आ पहुँचे जो कलकत्ता उच्च न्यायालय के वकील थे। उनके ही घर रहकर वे हिन्दी पुस्तकों का अंग्रेजी अनुवाद करने लगे जिसके लिए उन्हे तीस रूपए प्रतिमाह मिलते थे। इसी समय उन्होने 'मन्दिर' नाम का एक गल्प लिखकर 'कुन्तलीन' नामक प्रतियोगिता में भेजा जिसमें वे विजयी घोषित हुए।

छः मास लालमोहन गंगोपाध्याय के घर रहने के बाद शरत्चन्द्र 1903ई के जनवरी मास में रंगून में लालमोहन गङ्गोपाध्याय के बहनोई वकील अघोरनाथ चट्टोपाध्यायेर के घर चले आए। अघोरनाथ उनके लिए बर्मा रेलवे के अडिट अफिस में एक अस्थायी नौकरी की व्यवस्था कर दिए। इन दिनों उनका संपर्क बंगचंद्र नामक एक व्यक्ति से हुआ जो था तो बड़ा विद्वान् पर शराबी और उछृंखल था। यहीं से चरित्रहीन का बीज पड़ा, जिसमें मेस जीवन के वर्णन के साथ मेस की नौकरानी (सावित्री) से प्रेम की कहानी है। दो वर्ष वह नौकरी करने के बाद वे उनके बन्धु गिरीन्द्रनाथ सरकार के आथ पेगु चले गए और वहाँ अबिनाश चट्टोपाध्याय के घर निवास किया। 1906ई के अप्रैल मास में बर्मा के पब्लिक वर्क्स एकाउण्ट्स ऑफिस के डिप्टी एग्जामिनर मणीन्द्रनाथ मित्र की सहायता से शरत्चन्द्र रंगून के इस ऑफिस में नौकरी पा गए और आगे के दस वर्ष यह नौकरी करते रहे।

1912ई के अक्टूबर मास में शरत्चन्द्र एक मास की छुट्टी लेकर घर लौटे तो 'यमुना' नामक पत्रिका के सम्पादक फणीन्द्रनाथ पाल ने अपनी पत्रिका के लिए उनसे लेख भेजने का अनुरोध किया। उसके अनुसार रंगून वापस जाने के बाद शरत्चन्द्र ने 'रामेर सुमति' नामक कहानी भेजी जो यमुना पत्रिका में बंगाब्द 1319 के फाल्गुन और चैत्र अंक में प्रकाशित हुई। इसके बाद उन्होंने 'भारतवर्ष' नामक पत्रिका के लिए भी लेख भेजना शुरू किया। फणीन्द्रनाथ पाल ने उनका 'बड़ दिदि' नामक उपन्यास पुस्तक रूप में प्रकाशित किया (1913 ई)। यह शरत् की प्रथम मुद्रित पुस्तक है। एमसी सरकार और संस तथा गुरुदास चट्टोपाध्याय एंड संस ने उनके उपन्यासों को पुस्तक रूप में प्रकाशित किया।

1915 ई. में शरत् का ‘यमुना' पत्रिका से सम्बन्ध-विच्छेद हुआ, और इसके उपरान्त वे नियमित रूप से ‘भारतवर्ष में लिखने लगे।1916ई में छुट्टी को लेकर हुए मनोमालिन्य के कारण शरत्चन्द्र नौकरी त्याग कर रंगून से घर वापस आ गए और वाजे-शिवपुर में रहने लगे।

बर्मा से लौटने के बाद उन्होंने अपना प्रसिद्ध उपन्यास 'श्रीकान्त' लिखना शुरू किया।जो 1917 में प्रकाशित हुआ।

1921ई. में उन्होंने कांग्रेस के आन्दोलन में योगदान किया। 1922 ई. में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से ‘श्रीकान्त' (प्रथम पर्व) का अंग्रेज़ी रूपान्तर प्रकाशित हुआ। इसके बाद से शरत् के यश में उत्तरोत्तर वृद्धि होने लगी। अनेक सभाओं तथा संस्थाओं के वे अध्यक्ष तथा मान्य सदस्य बनाये जाने लगे।1936 ई. में ढाका विश्वविद्यालय ने उन्हें आनरेरी डी. लिट्. की उपाधि प्रदान की। अपने जीवन के उत्तर काल में शरत् रवीन्द्रनाथ के भी स्नेह तथा प्रशंसा के भागी रहे।

16 जनवरी1938 ई. को कलकत्ता पार्क नसिंग होम में  62वर्ष की अवस्था में शरच्चन्द्र का निधन हुआ। विष्णु प्रभाकर द्वारा अवारा मसीहा शीर्षक रचित से उनका प्रामाणिक जीवन परिचय बहुत प्रसिद्ध है।

📚उपन्यास

बड़दिदि, १९१३
बिराजबौ, १९१४
परिणीता, १९१४
बैकुन्ठेर उइल, १९१५
पल्लीसमाज, ११६
चन्द्रनाथ, १९१६
अरक्षणीया, १९१६
पन्डितमशाइ, १९१७
देवदास, १९१७
चरित्रहीन, १९१७
श्रीकान्त १, १९१७
निष्कृति, १९१७
श्रीकान्त २, १९१८
दत्ता, १९१८
गृहदाह, १९२०
बामुनेर मेये, १९२०
देना पाओना, १९२३
नबबिधान, १९२४
पथेर दाबी, १९२६
श्रीकान्त ३, १९२७
शेष प्रश्न, १९३१
बिप्रदास, १९३५
श्रीकान्त ४, १९३३
शुभदा, १९३८
शेषेर परिचय, १९३९

🎭नाटक

षोड़शी, १९२८
रमा, १९२८
बिराज बौ, १९३४
बिजया, १९३५

👉गल्प

रामेर सुमति, १९१४
बिन्दुर छेले, १९१४
पथ-निर्देश, १९१४
मेजदिदि, १९१५
आधाँरे आलो, १९१५
दर्पचूर्ण, १९१५
काशीनाथ, १९१७
छबि, १९२०
बिलासी, १९२०
मामलार फल, १९२०
हरिलक्षी, १९२६
महेश, १९२६
अभागीर स्बर्ग, १९२६
अनुराधा, १९३४
सती, १९३६
परेश, १९३६

✍️निबन्ध

नारीर मूल्य
तरुणेर बिद्रोह, १९१९
स्बदेश ओ साहित्य, १९३२
स्बराज साधनाय नारी
शिक्षार बिरोध
स्मृतिकथा
अभिनन्दन
भबिष्यत् बंग-साहित्य
गुरु-शिष्य संबाद
साहित्य ओ नीति
साहित्ये आर्ट ओ दुर्नीति
भारतीय उच्च संगीत

🏆जगत्तारिणी गोल्ड मेडल (कलकत्ता विश्वविद्यालय, 1923),
मानद डी.लिट्. (ढाका विश्वविद्यालय,1936),
कुंतोलिन पुरस्कार

🎥चलचित्र

शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के कई रचनाओं का कई भारतीय भाषाओं में पचास फिल्मों में रूपान्तरण हुआ हैं। विशेष रूप से, उनके उपन्यास देवदास को सोलह संस्करणों में बनाया गया है तथा परिणीता को  बंगाली, हिंदी और तेलगु में दो बार बनाया गया है। ऋषिकेश मुखर्जी द्वारा 1967 में निर्मित मझली दीदी तथा स्वामी (1977) को सर्वश्रेष्ठ कहानी के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। एक और प्रसिद्ध फिल्म छोटी बहू (1971) अपने उपन्यास बिंदुर छेले पर आधारित है। उनके उपन्यास 'दत्ता' को बंगाली फिल्म (1976) में सुचित्रा सेन और सौमित्र चटर्जी की प्रमुख भूमिकाओं में अभिनय किया गया था। 

उनके उपन्यास पर आधारित अन्य फिल्मों में निष्कृति, और अपना पराया (1980) हैं, जो अमोल पालेकर मुख्य  भूमिका में हैं। तेलुगू फिल्म थोडी कोडल्लू (1957) भी इस उपन्यास पर आधारित है। गुलजार की 1975 की फ़िल्म, खुशबू उनकी रचना पंडित मशाय से प्रेरित हैं। आचार्य अत्रेय द्वारा 1961 तेलुगू फिल्म वाग्दानम उनके उपन्यास दत्ता पर आधारित है। इसके अलावा 2011 की फिल्म आलो छाया उनकी छोटी कहानी, आलो ओ छाया पर आधारित है।

1928 देवदास (1928 फ़िल्म) बंगाली भारत देवदास
1935 देवदास (1935 फ़िल्म)  बंगाली देवदास
1936 देवदास (1936 फ़िल्म)  हिन्दी देवदास
1937 देवदास (1937 फ़िल्म) असमिया देवदास
1942 परिणीता (1942 फ़िल्म)बंगाली परिणीता
1947 रामेर सुमति बंगाली रामेर सुमति
1950 मेज दीदी बंगाली "मेजदीदी" (लघुकथा)
1951 दत्ता बंगाली दत्ता
1953 देवदास (1953 फ़िल्म) तेलुगु/तमिल (द्विभाषी) देवदास
परिणीता (1953 फ़िल्म)  हिन्दी परिणीता
1954 बिराज बहू हिन्दी बिराज बौ
1955 देवदास (1955 फ़िल्म) हिन्दी देवदास
1957 बार्डिडी बंगाली बोरोडी
1958 मनमलाई  तमिल परिणीता
राजलक्ष्मी ओ श्रीकांत बंगाली श्रीकांत
1959 इन्द्रनाथ श्रीकान्त हे अन्नदादीदी बंगाली श्रीकांत
1961 बतासारी तेलुगू बोरोडी
कनाल नीर तमिल
1965 देवदास (1965 फ़िल्म) अरु पोर देवदास
1966 रामेर सुमति बंगाली भारत
1967 मझली दीदी  हिन्दी "मेजदीदी" (लघुकथा)
1969 कमलाता बंगाली श्रीकांत
परिणीता (1969 फ़िल्म)  बंगाली परिणीता
1971 छोटी बहू हिन्दी पॉइंटर चेले
1974 देवदास (1974 फ़िल्म) तेलुगू देवदास
1975 खुशबू हिन्दी पंडित मोशाय
1976 दत्ता बंगाली दत्ता
संकोच  हिन्दी परिणीता
1977 सब्यसाची बंगाली पाथेर दबी
स्वामी हिन्दी मंदसौर
1979 देवदास (1979 फ़िल्म) बंगाली देवदास
1980 अपने पराये  हिन्दी निष्कृति
1982 देवदास (1982 फ़िल्म) बंगाली बांग्लादेश देवदास
1985 रामेर सुमति रामेर सुमति
1986 परिणीता (1986 फ़िल्म) परिणीता
1987 राजलक्ष्मी श्रीकांत श्रीकांत
2002 देवदास हिन्दी भारत देवदास
देवदास हिन्दी देवदास
2003 मेज दीदी बंगाली "मेजदीदी" (लघुकथा)
2004 इति श्रीकांत बंगाली श्रीकांत
2005 परिणीता (2005 फ़िल्म)हिन्दी परिणीता
2009 देव डी हिन्दी देवदास
2013 देवदास (2013 फ़िल्म) बंगाली बांग्लादेश देवदास
2014 आलो छाया बंगाली भारत आलो छाया
2018 दास देव हिन्दी देवदास
2019 राजलोकी ओस्टार्को बंगाली श्रीकांत
2021 चाँद की नाव पर सवारी  बंगाली गणेश
2023 दत्ता  बंगाली दत्ता

✍️👉लेखक के रूप में

वर्ष पतली परत भाषा देश से अनुकूलित
1982 चरित्रहीन  हिन्दी भारत कोरिट्रोहिन
1985-86 श्रीकांत हिन्दी भारत श्रीकांत
2018–वर्तमान कोरिट्रोहिन बंगाली भारत कोरिट्रोहिन
2021 प्यार में औरतें हिन्दी भारत कोरिट्रोहिन
2022 श्रीकांतो बंगाली भारत श्रीकांत

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